01/07: My Brother

Category: General
Posted by: Sushil Bansal
Here's To My Brother

Here's to my brother
Remember every day
No matter what I've said
Here's what I'd like to say
I will always love you
Be with you till the end
When no one else is around
I will be your friend
I love my brother
and I always will
I'm proud to be your sister
that's how I feel And someday when we're far away
And the miles keep us apart
I'm gonna whisper
I love my brother
And you'll know it in your heart
Category: General
Posted by: Sushil Bansal
हम किसी भी स्तर पर हों, हमारा दृष्टिकोण सदैव नैतिक होना चाहिए.यदि हम नैतिक नहीं हैं तो हमारी कोई भी उपलब्धि स्थाई नही हो सकती. समय के साथ कई लोग काफी ऊँचाई तक पहुँच जाते हैं और फिर अचानक जमीन पर औंधे मुँह दिखाई देते हैं. इसका कारण उनकी प्रगति के आधारों का अनैतिक होना होता है.हम कुछ भी करें, किसी भी स्तर पर हों, हमें सदैव नैतिक ही रहना चाहिए.यह सोच सुख देने वाला होता है.
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Posted by: Sushil Bansal
प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में ऐसे कई लोग मिलते हैं,जो किसी -न-किसी रूप में सहायक हो जाते हैं.वे बिना किसी प्रतिदान की अपेक्षा के अपनी भूमिका निभाकर अलग भी हो जाते हैं.वास्तव में हम स्वयम को उनका ऋणी महसूस कर रहे होते हैं,जबकि उन्हें हमसे कोई अपेक्षा नहीं रहती.इसमे याद रखने की बात यह है कि जीवन में हमें भी यदि किसी को भी सहयोग कराने का अवसर मिलता है तो बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के सहयोग करते रहना चाहिये.
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Posted by: Sushil Bansal
पर्यावरण जीवन और पृथ्वी के अस्तित्व से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है. इसके बावजूद अकसर अनजान लोग तो दूर, स्वयम को समझदार मानने वाले लोग भी इसकी उपेक्षा करते हैं.यह भी सही है कि विकसित समाज पर्यावरण को जितना नुकसान पहुँचा रहा है,उतना पिछडे लोग नहीं पहुँचाते.सभ्यता विकसित होती गई और पर्यावरण बिगड़ता गया.स्थिति यह है कि पर्यावर्णीय कारणों से प्राकृतिक चक्र निरंतर असंतुलित होता जा रहा है.यदि हम नहीं सुधरे तो एक के बाद एक प्राक्रतिक प्रकोपो का हमें सामना करना होगा.
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Posted by: Sushil Bansal
देश की कई में बुरी स्थिति हम-आपको कई बार आक्रोशित करती है.निश्चित तौर पर हमें गुस्सा आना भी चाहिए.भ्रष्टाचार,अव्यवस्था और अनैतिकता यदि हमें आक्रोशित नही करते तो यह अच्छा नही कहा जा सकता.किंतु केवल कुड कर राह जाना भी अच्छा नही है.एक नागरिक के नाते हमें अपने आसपास और देश में कही भी यदि कुछ ग़लत हो रहा है तो उसका विरोध करना चाहिए.विरोध का तरीका हमारी अपनी स्थिति पर निर्भर करता है.विरोध के लिए झंडा-डंडा ही जरूरी नही हैं.हम किसी भी गडबडी का पत्र लिमामलों खकर भी विरोध कर सकते हैं.समान विचारों वाले लोग एकसाथ हो कर ज्यादा प्रभावी रूप से अपना विरोध जाता सकते हैं.यदि हम कुछ ग़लत देखे तो चुप ना रहें.
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Posted by: Sushil Bansal
उजियारे में,
अंधकार में,
कल कहार में,
बीच धार में,
घोर घृणा में,
पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में,
दीर्घ हार में,
जीवन के
शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

17/06: भूख

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Posted by: Sushil Bansal
बस्ती पे उदासी छाने लगी,
मेलों की बहारें ख़त्म हुई
आमों की लचकती शाखों से
झूलों की कतारें ख़त्म हुई

धूल उड़ने लगी बाज़ारों में,
भूख उगने लगी खलियानों में
हर चीज़ दुकानों से उठकर,
रूपोश हुई तहखानों में

बदहाल घरों की बदहाली,
बढ़ते-बढ़ते जंजाल बनी
महँगाई बढ़कर काल बनी,
सारी बस्ती कंगाल बनी

चरवाहियाँ रस्ता भूल गईं,
पनहारियाँ पनघट छोड़ गईं
कितनी ही कंवारी अबलायें,
माँ-बाप की चौखट छोड़ गईं
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Posted by: Sushil Bansal
कितना निष्ठुर था वो पतझड़,
जीवन युक्त होकर भी कितने
निर्जीव लगते थे वो वृक्ष,
न कोई संवाद, न वाद-विवाद,
बस खड़े खड़े सहते रहते थे,
शिशिर की नम रातों में
उग्र समीर का आर्तनाद |
हे शशि इस तम् के सागर
का कोई है क्या पार कहीं,
कैसे सहते हैं जीव सभी
इस शीत रिपु के सर्प दंश |
निरुत्तर शशि, मौन धरा
स्तंभित शतदल, क्षीण प्रभा
संकुचित होकर शशि,
घनदल के पीछे छिप चला,
मीलों दूर किसी श्रृगाल ने
सहमति में हुंकार भरा |

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Posted by: Sushil Bansal
मैं तो बिन्दु हूँ
अमृत-समुन्दर का,
छोड़ समुन्दर अम्बर में
ऊपर चला गया था ।
अब नीचे उतर
मिला हूँ अमृत- धारा से ;
चल रहा हूँ आगे
समुन्दर की ओर ।
पाप-ताप से राह में
सूख जाऊँगा अगर,
तब झरूँगा मैं ओस बनकर ।
अमृतमय अमृत-धारा के संग
समा जाऊँगा समुन्दर में ॥
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Posted by: Sushil Bansal
तब से अब तक
यद्यपि बहुत बार .....
एकत्रित किया रेखाओं को,
रचने भी चाहे सीमाओं से
मन के विस्तार ..... ॥

फिर भी कल्पना को आकृति ना मिली
ना कोई पर्याय, ना कोई नाम
बिछी है अब तक मेरे और कैनवस के बीच
एक अनवरत प्रतीक्षा ....
जो ढंढ रही है अपनी बोयी रिक्तताओं में
अपनी ही सृष्टि का सार