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Posted by: Sushil Bansal
क्यों आलतू - फालतू सोच कर मन मलिन कर रही है? उसने सख्ती से बिखरते हुए मूड को कसा और एकाग्र हो दुबारा छितरी भीड क़ो आंखों में समेटने लगी।

'' हैलो! क्या देख रही हैं, लंच लीजिये ! प्लीज'' मिस्टर सिंह थे।
'' कुछ नहीं।'' हकबकायी सी वह अपने फीके चेहरे को मुस्कान से सायास सहज करती हुई उनके साथ घिसटते हुए तकल्लुफी बातों में अपने आप को खपाने लगी।

'' गुड गॉड।'' वह दूर - दूर तक देख रही थी। वे अब करीब ही थे। उसकी दाहिनी ओर की सर्विस टेबल के पास प्लेट पकडे हुए किसी से बतिया रहे थे। वह मिस्टर सिंह को दरकिनार करते हुए आतुर कदमों की डगमग चाल से उन तक पहुंची।
'' कब आयीं?''
'' कुछ देर पहले।'' कहकर वह अभिमुख थी। उनके आस - पास की भीड से चेतस जबरन सादा मुस्कुराहट में भी उसे व्यंजना भरे अर्थ की कौंध लपकती - सी लगी। वह गुस्सा भूल सहज हो गयी। स्तब्ध आंखों की टकटकी जब झेली नहीं गई तो झंपायी - सी सामने दहकी धूप में चटकीले फूलों की सघन क्यारी को निरखने लगी। वे लोग पहले भी मिलते रहे हैं। औपचारिकता से बंधे विभागीय बैठकों में। परसों ही उनका फोन आया था।
'' तुम आओगी? पार्टी में वहां से कहीं चलेंगे हमें बात करनी चाहिये। वी मस्ट''
'' आर यू सीरियस?'' बात काटते हुए वह अपना सन्देह जुबान पर लाने से रोक न पाई थी।
'' तुम आओगी तो बात करेंगे, प्रॉमिस।'' और फोन चुप पड ग़या था। उसका जवाब श्योर ' उसके कण्ठ में ही अटका रहा गया था।

'' लन्च नहीं लोगी?''
'' लन्च लेकर ही चली थी।'' बिना सोचे - समझे मुंह से निकल गया। लंच पार्टी का निमन्त्रण हो तो कोई ऑफिस से लंच लेकर निकलता है? अपनी गडबडाहट पर वह स्वयं विस्मित थी।
'' कुछ स्वीट ही ले लो।
अधीनस्थ की तरह आदेश की अनुपालना में यंत्रचालित सी उसने प्लेट उठायी और टेबल की ओर बढ चली। अब वह उनके सामने लॉन में कुर्सी पर बैठी हुई चम्मच से छोटे - छोटे कौर निगल रही थी।

कुछ दिनों से वह परेशान थी। असमंजस में थी। भीतर से उठती चेतावनियां। तुम फिर खतरा उठा रही हो। दांव पर लगा रही हो अपनी स्वतन्त्रता निजता। वह बहरी बनी हुई थी और प्रतीक्षा के आकुल तनाव में थी। कभी - कभी हम बेसबरे होकर प्रतीक्षा भी करते हैं और सद्य: जन्मे बच्चों की तरह घटित नये संसार में प्रवेश के डर से मुट्ठियां कसे रहते हैं। दो आसक्त व्यक्तियों का अपनी अपनी खूंटियों से छिटक कर मुठभेड क़ी आत्मविध्वंसक घटना। संघर्षण की चकाचौंध चिनगारियों से नजर चुरा लेना मुश्किल है। इस दुर्घटना के बाद ही सम्बन्ध की नींव पडेग़ी। असहनीय जान पडता है सब कुछ, कल्पना का सच ज्यादा विकराल होता है। घटित न होते हुए भी मानसिक आवर्तन के कारण हमेशा ग्रसित किये रहता है वह हैरान और आकुल थी। रसज्ञता के मुहाने पर विगत जीवन के विषाक्त अनुभवों के पत्थर क्या पिघल गये हैं? मरणासन्न कर देने वाली घुटन से वह तलाक द्वारा निजात पा चुकी है।

जीवनयापन की आत्मअन्वेषित शैली में नियोजित - व्यवस्थित हो गयी है। दुबारा भावुकता के दलदल में खुद को लथेडना फिर खुद ही अपनी आशंकाओं का प्रतिवाद करने लगी। पत्थर की लकीर से ढले व्यक्तित्व का क्षरण कहीं संभव है? यह तो जीवन में सरसता की छोटी सी मांग है। जिसे स्वीकार कर वह आज यहां उनके बुलाने पर आ गई है।

सोच के बोझिल अन्धड से अकुलाई आंखें उनके चेहरे पर केन्द्रित हो गयीं। जैसे सारी उहापोह और शंकाओं का समाधान उनके चेहरे पर लिखा हो। क्या ये ही हैं सचमुच मैं आकर्षित हूं, चाहत में हूं?

उनका प्लेट पर झुका चेहरा ऊपर उठा। अब उसकी प्लेट पर सिर झुकाने की बारी थी। क्या अब सोचने और निर्णय लेने को कुछ नहीं बचा है? संशय के ये कैसे फनफनाते पल हैं जो प्रेम से पहले घुमडते हुए सिर उठा लेते हैं।

एक सज्जन उनसे बात करने के लिये आये। वह भी कुर्सी से उठ गयी। उसका परिचय देते हुए वे दृढता से
माय फ्रेण्ड कह गये। तो उन्हें वह स्वीकार्य है। और उसे ? बेचैनी भरी ऐंठन उठी और वह घबरा कर इधर - उधर देखने लगी। घास शारदीया धूप में गीले पुते रंग सी तरल - चटख थी। कच्ची फुलवारी की कतारें शोख रंगों का झमाझम आलोक बिखेरती हुई इठला रही थीं। हठात् वह चौंकी। उन दोनों की बातचीत तीखी हो गयी थी। बातचीत में से चाकू पर धार चढाते समय जैसे स्फुलिंग छूट रहे थे।

वे सज्जन क्रोध में पांव पटकते हुए चल दिये। वे दोनों वापस अपनी - अपनी कुर्सियों पर थे। वे खासे विचलित नजर आ रहे थे। धीमी लय के साथ नकारात्मक ढंग से सिर को दायें - बाएं घुमाते स्वयं से उलझे हुए थे। ऐसी देह मुद्रा - जब आप जो कहना चाहते हैं, माकूल समय पर कह नहीं पाते हैं। बाद में पछताते हैं।
प्रशस्त पेशानी पर मध्यम वयस की रेखाएं। निखरी आंखों की कोरों पर उम्र की चुगली महीन झुरियां । तीखी नाक। पार्श्व से देखने पर यह तीखापन चुभता सा लगता है। सजग गाम्भीर्य की तनी भावमुद्रा! प्राय: उन पुरुषों में देखने को मिलती है जो अपने ध्येय और उसके कौशलपूर्ण निवाह की सतत चेताना से आदीप्त रहते हैं

अन्तरंग पुरुष द्वैतियक हो ओझल हो जाता है। देखने - जानने वाले को इस आयास सजगता से ही संतोष करना पडता है। लेकिन आज इस मुद्रा में वे उघड ग़ये थे। बेहद साधारण और निरुपाय नजर आ रहे थे।

उन्हें इस मालिन्यपूर्ण मन:स्थिति से बाहर निकालने के उद्देश्य से ही वह हस्तक्षेप कर उठी।

'' क्या बात है? वे कौन थे? ''
'' कुछ नहीं '' कहकर उन्होंने फिर सिर को पछतावे वाले अन्दाज में झटक दिया।

वह उन्हें - बताओ न, बताते क्यों नहीं वाली मुद्रा से कुरेदती रही। वे अनिच्छापूद्र्याक बताने लगे। स्वार्थों के टकराव और पदोन्नति का विभागीय किस्सा। बहस का अन्त ट्रिब्यूनल में केस चलाने की धमकी से हुआ था। फिर स्वयं ही अप्रीतिकर घटना की तात्कालिकता से उबरते हुए बोल उठे, '' चलो ! कहीं चलते हैं।''

बाहर निकलने में ही दस - पन्द्रह मिनट लग गये। एन पार्टी के बीच में से उन्हें जाता हुआ देखकर सभी को उनसे महत्वपूर्ण बात निपटाने की जरूरत महसूस हो उठी थी। बे खीज दबाते हुए लोगों से निपट रहे थे।

उन्हें कोफ्त महसूस होने लगी। इस तरह पार्टी के बीच से उठ कर जाना नोट कर लिया जायेगा। सत्रह - अठारह साल की होती तो दुनिया मेरी जूती की नोक पर की आलम फरेब मुद्रा में कन्धे उचका कर पीछे - पीछे चल सकती थी। मध्यम वयस के पक्केपन में अंजाम की सजगता पांव बांध देती है। भावात्मक आवेग से जुडने में परिपक्वता उतनी ही बडी बाधा है जितना अबोध वय का जोश। सोचते हुए वह उनके खाली होने का इंतजार करने लगी।

कार में बैठते हुए वे मुक्त ढंग से मुस्कुराते हुए बोले, '' सॉरी! बोर किया न तुम्हें।''
'' इम्पोर्टेंट आइडैन्टिटि - आपको तो अच्छा लगता होगा।''
'' लगता है - पर हमेशा नहीं, खासकर जब आप अकेले हो जाना चाहें।''

दोनों मुक्त हास से हल्के हो गये। सामान्य वार्तालाप में अन्तरंगता के सूत्र जुडने लगे। हवा में डोलती अकेली घास की तन्वंगी तने - सी सरसराहट उसे अपने में व्यापती लगी कुछ अचाक्षुष सा घटित होता हुआ छाता चला जा रहा था और वह गहरी सांस लेते हुए बेसुध सी सब समेटते हुए पोसरी होती चली जा रही थी।

अजीब बात थी, अन्त:चेतना का एक अंश उमडता हुआ इस नशे का विरोध करता हुआ चेतावनियां ठोक रहा था। उसे ध्यान आया। अभी जिस व्यक्तित्व के आकर्षण से वह अपने आपको विवश पा रही है, थोडी देर पहले वह कितने साधारण निरुपाय नजर आ रहे थे। और अब जिसे हम जुडना कहते हैं वह आदर्श छवि तोडक़र प्राप्ति का सहज वरण है या उस स्वप्न - छवि की टूटी प्रतिमा का पुनर्निर्माण? वह सचमुच असमंजस का शिकार हो चली थी। क्या वह इस रिजिडनेस को विर्दीण कर भीतरी परत को देखना - भोगना चाहती है?

लेकिन वह उत्फुल्ल - प्रसन्न थी, उनके साथ। यकीनन थी। क्या यही काफी नहीं?

बडे होटलों की चमाचम सजावट उसे हमेशा पटाखों - सी फूटती दु:सह जान पडती है। लप - झप में आंखें बार - बार जा अटकती हैं। सोचने - महसूसने की एकाग्रता भंग हो जाती है।

वे दोनों कॉफी पी रहे थे।

अपनी तरफ एकटक नजरों की बौछार से वह सकुचा गई। गालों पर सुर्ख आंच थिरकने लगी। आक्षेप भरी नजरों से उलाहने लगी। '' क्या देख रहे हो? देखना अब भी बाकि है? '' कुछ कहने की तत्परता क्षणांश भर के लिये उठी। फिर लुप्त हो गयी। आरक्त आंखों में गुलाब के फूलों का रंग था।

'' क्या प्रोग्राम है? ''
'' आप बताइये।'' वह इतना ही कह पाई। आपने बुलाया है, कहने की इच्छा घोंट गयी।
'' नथिंग स्पेशल।'' वे उकसाते हुए शरारतन मुस्कुरा रहे थे।

मुस्कुराहट तो ठीक है - लेकिन वे एक हाथ से दूसरे हाथ का नाखून छील रहे थे। उसने गौर किया। हाथ असामान्य थे - सफल व्यक्तियों की तरह मध्यमा की उंचाई को छूती अन्य उंगलियां। नाखून छीलने की मुद्रा खासी अभद्र थी। उसकी इच्छा हुई उन्हें टोक दे। नाखून इस तरह मत छीलो- इसका मतलब होता है

प्रेम उपजे या न उपजे। अधिकार का अंकुश भाव उससे पहले आ जाता है। उसने पर्स से इलायची निकाल कर आगे बढा दी।

'' यह पान - सुपारी, इलायची - छोटे छोटे अपराध मैं नहीं करता।''
'' बडे अपराध करने का शौक फरमाते हैं?'' शब्दों की सादी बिसात के पीछे रसिकता का पुट चकचका गया।
'' हां करता हूं, कर रहा हूं। '' कह कर उन्होंने धीरे से आंख दबायी।

वह अजीब उत्सुकता की उठान से उध्दत हो गयी। उनकी जिन्दगी के छिपे कोने में दबे पांव नि:शंक घूमने - खंगालने की इच्छा में वह सुलगने लगी। उससे पहले कौन थी? कोई थी या नहीं? अपने - अपने पद, विवाहित जीवन और दुनियादारी से अलग नितान्त निजी परछाइयों के महीन साये, आवेग का आच्छादन - एक समानान्तर दुनिया।

वे दोनों भी तो शुरुआत कर रहे थे। अपराध के सृजन की आरंभिक लीला। ईश्वर जानता है। जिन्दगी गुनाहों पर ही टिकी है। वे चोर नजरों से घडी देख रहे थे।

'' कहीं जाना है? ''
'' नहीं! आदत पड ग़यी है बार बार घडी देखने की। यू नो चाह कर भी इस्केप नहीं कर सकता। सब सेक्रेट्री की नोटबुक में दर्ज रहता है।अक्सर घर से फोन पर पूछताछ होती रहती है। नोटलैस खोया हुआ समय यही तो मैं चाहता हूं ।'' बुदबुदाते हुए उनकी आंखों में किसी अज्ञात स्वप्न के कतरे तैर रहे थे। आर्द्र आकुलता से भरे हुए शब्द फूटे।
'' खैर! तुम तो आजाद हो - फ्री बर्ड।''
'' क्यों कैसे हूं?''
'' मतलब तलाकशुदा हो।'' आधी बात कह कर वे सुनने की प्रत्याशा में उसे देखने लगे।
'' यूं तो आजाद हूं। पर इस आजादी की अपनी गुलामी है। पुराने अनुभव और फिर अन्तरंग सम्बन्धों में जो जकडन होती है। एक बार भुगत कर आजाद होने के बाद'' कह कर वह बात पी गई।

सचमुच। उसने कल्पना भी नहीं की थी। बहुत सी चीजें कल्पना के बाहर छूट जाया करती हैं। वे फिर भी बची रहती हैं। कल्पना की मुंडेर पार कर कब वास्तव के धरातल पर आ उतरती हैं - कोई नहीं जानता। कितनी कसमें खायीं थीं तलाक के बाद। कांच की किरचों सी चुभन भरी जलन से इन रिश्तों को नहीं, आपके कार्य को ही जीवन का ध्येय होना चाहिये। उडती बदलियों से नश्वर सुख कहीं नहीं पहुंचाते। लेकिन आज न केवल वह उनके निमन्त्रण पर आई है, अपितु बुलाये जाने की प्रतीक्षा भी करती रही है।

फिर अन्तर्निहित सोच को तोडते हुए बरबस बोल उठी, '' इमोशनली डिपेन्डेन्स अब लगता है बरदाश्त नहीं कर पाऊंगी मैंनामुमकिन लगता है।''
'' तुम्हारी बात मैं समझा नहीं।''
'' मेरा मतलब। पजेसिवनेस से उपजा, दूसरे को नियन्त्रित और शासित करने का जो मेनहुड ओरियेन्टेशन है। वह बहुत।''
'' दैट्स आल! जो तुम्हें हर्ट करता है। पजेसिव होना तो सम्बन्ध की स्वीकृति है। तुम खुद पजेसिव नहीं हो जातीं?''
'' अभी तक तो। जो सही मानती हूं उसके पालन करने का अभ्यास है मुझे।''
'' यहां से चलें।'' कहते हुए उनका चेहरा म्लान हो गया। वे शायद बुरा मान गये।

ये तो बहुत टची हैं। जरा सी बात पर मुंह फुलाने वाले। ऐसा कैसे चलेगा? यह क्या झमेला पाल लिया। कार में बैठते ही उन्होंने फिर घडी देखी, '' ओह! चार बजे सिटिंग है, अभी तो हमारे पास काफी समय है।'' ड्रायवर आदेश की प्रतीक्षा कर रहा था।
'' तुम बताओ कहां चलें?''
'' होटल में टॉप फ्लोर रेस्ट्रां है।''

रास्ते में वे दोनों चुप थे। बतियाई हुई एक - एक बात उसके दिमाग में घूम रही थी। आवृत्तियों में घूमते हुए अनुगूंजित होकर दोहरे - तिहरे अर्थ खुल रहे कर उसे आक्रान्त कर रहे थे। उद्विग्न होकर वह कार की खिडक़ी से बाहर देखने लगी।

उन्होंने इकॉनामिक टाइम्स उठा कर पढना शुरु कर दिया।

लिफ्ट में दोनों अकेले थे। पहली बार इतने नजदीक और घनीभूत आयत में आबध्द। उसे धुकधुकी सी महसूस होने लगी। कामनाओं की मूर्तिमान कल्पनाएं उसकी आंखों में तिरने लगीं।

होटल की छत पर कृत्रिम उद्यान था। घास नरम धूप में मखमली हरेपन में उजलाई हुई थी। सूरज पर बदलियों का पहरा था। धूप सिर्फ रोशनी थी जिसमें गमलों में लगे पौधे खोये - खोये से आत्मलिप्त खडे थे। हर चीज ठहरी और ठिठकी हुई।
'' तुम्हें खुले में बैठना अच्छा लगता है? ''
'' हां। बहुत।'' चौंककर उसने जवाब दिया। इतनी देर की चुप्पी वे साधारण सी बात से तोड रहे थे।
'' मैं अभी भी पूरा दिन बाग - बगीचों में बैठे हुए गुजार सकती हूं। कॉलेज के दिनों में तो।'' बोलते - बोलते वह रुक गयी। उसे लगा इतने पीछे जाना अनावश्यक है।
'' इस तरह घूमनायाद नहीं। इस तरह समय गुजारा हो। बहुत ओवर पैक्ड रहता हूं। टाइम ही नहीं मिलता। यू नो! हर चीज क़ी उम्र होती है।'' स्वर निर्णायक और निर्मम था।

वे खुद को चेता रहे हैं या उसे? क्या वे भी अनिश्चय में हैं? किनारे पर खडे ज़ल में हाथ डाल कर जायजा भर ले रहे हैं? यह उनकी बात का साइकिक प्रोजेक्शन है या उसके भीतर तक धंसा प्रेम के प्रति भय। वह अपने मनोभावों का प्रक्षेपण उनकी बातों में ढूंढ रही है?

'' हां, होती है। हर चीज क़ी उम्र होती है।'' कहते हुए कुछ धप से उसके अन्दर मुरझा गया। सचमुच प्रेम करने की भी उम्र होती है। इतने दिनों तक वह मरीचिका में आंखें उलझाए बैठी रही? सूरज पर से बदलियों का पहरा हट चुका था। अस्ताचलगामी होने से पहले अपनी अन्तिम आग धरती पर बेरहमी से बरसा रहा था। दूर इमारतों की छतें, पेड - पौधे सब चमकते हुए आंखों में चिलक भरते चुभ रहे थे। वह लय तिरोहित हो चुकी थी जो
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Chandigarh, January 9
The Institute for the History of Medicine (IGM), Stuttgart, Germany, in collaboration with Goethe-Institute Max Mueller Bhavan, New Delhi, organised an exhibition on “Homoeopathy- A medical approach and its history” at Homoeopathic Medical College and Hospital, Sector
26, here.

The exhibition will remain open for public till January 18. Visitors will learn about the healthcare system of the 18th century, Dr Samuel Hahnemann’s life and his work and growth of homoeopathy towards its present day worldwide significance.

Clemens Kroll, cultural councillor, German Embassy, New Delhi, was the chief guest at the inauguration function and Dr MS Bains, director, AYUSH, Chandigarh, was the guest of honour.

Surinder Singh Maken, director, Goethe-Zentrum, Chandigarh, has informed that Prof Martin Dinges from the Institute for the History of Medicine, Stuttgart, Germany, who is also curator of the exhibition, will also be holding a workshop on the “World history of medicine”.

This is for the first time that an exhibition on homoeopathy from Germany will be held in Indian cities.

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Life story

The poems would evoke a sense of empathy in readers as all I have written is just truth and truth is common to us all,” says Sushil Bansal Sheel, who released her books, Ahsaas Ke Pal and Anmol Pal at Central and State library, 17 in collaboration with the American Council. Ahsaas Ke Pal is a compilation of 90 verses that are based on her life experiences. “Life is the most influential teacher in itself. All that I have gone through, good or bad, have been penned down in form of poems in the book. Also, some poems are based on the compulsive social norms that we follow in the society,” says Sheel, now based in the US. She is an interior decorator by profession.

Her second book, Anmol Pal comprises several short stories. Letting us know more about her stories, she says, “All the 201 stories depict my life story. I didn’t want to lose account of several things that have inspired me and have touched my heart and so wrote them in the form of stories.” According to her what makes her stories a worth reading is their simplicity. “There are no hidden meanings and the messages I am trying to convey will reach everybody.” —Ashima Sehajpal

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Posted by: Sushil Bansal

साहित्य जो किसी समाज और देश का आईना होता है, वह मेरे ख्याल से एहसास के सिवा कुछ भी नहीं है; सम्वेदनाओं का यह एहसास जिसकी गहरी चोट हृदय को भेद देती है तो एहसास की इस चोट के फलस्वरूप जो प्रतिक्रिया होती है वह किसी मनुष्य की लेखनी द्वारा साहित्य में परिणत हो जाती है। और एक सामान्य मनुष्य, कवि, लेखक और शायर के रूप में प्रस्फुटित होता है। आदिकवि कहे जाने वाले संस्कृत महाकाव्य रामायण के रचयिता महाकवि वाल्मीकि ने अपने साहित्यिक जीवन के आरम्भ से पूर्व अनेकों हत्याएं कीं, लोगों को लूटा। एक दिन जब वे ध्यान में मग्न थे कि देखते हैं एक हंस का जोडा तालाब में कलरव कर रहा है इतने में एक शिकारी के तीर से हंस के जोडे में से एक मर जाता है, दूसरा वहां से अकेले उड ज़ाता है।फिर यही हंस शिकारी के जाने के बाद बार बार उसी स्थान पर आकर अपने बिछुडे हुए साथी को देखता है। यही सम्वेदनापूर्ण एहसास कठोर व क्रूर वाल्मीकि के हृदय पर ऐसी चोट कर बैठता है कि उनके अन्दर छिपी हुई करुण भावनाएं साहित्य के प्रथम श्लोक के रूप में प्रस्फुटित हुईं।
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Posted by: Sushil Bansal
आंसू

आंसू पलकों की सीपियोंमें छुपा हुआ एक अनमोल मोती है। इसका का मानव जीवन में बहुत महत्व है। आंसू किसीका स्वागत करते समय भी झलकते हैं और जुदाई के समय भी कुछ बोल जाते हैं। आंसू समाधान से भी बहते हैं और संताप से भी ।

आंसू की भाषा समझने के लिये उसकी कीमत जान लेनी चाहिये। वे किसी महाकाव्य की प्रेरणा भी बन सकते हैं। बडे बडे प्रबंध लिखके भी आंसू का महत्व बयान नहीं किया जा सकता जो एक बूंद में सब कुछ कहे जाते हैं। आंसू की एक बूंद में मानव जीवन का सारा सार समाया हुआ हैं।
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Posted by: Sushil Bansal
एक रविवार की रात वह पार्टी से घर लौटी तो उसकी परिचारिका श्यामा ने उसे एक लिफाफा थमाया ,उसके मन में पहला विचार यही आया कि ममा ने फिर वही राग अलापा होगा ,पर जब बेमन से उसने उसे खोला तो चौंक पड़ी ,वह उसके घर खाली करने का नोटिस था। संभवत: उसके कांट्रेक्ट की समय सीमा समाप्त हो गई थी । सायना चिन्ता में पड़ गई, घर बदलने का अर्थ था, पूरी व्यवस्था बदलना । आस पास घर तो मिलने से रहा। यहां तो श्यामा ने उसके घर की व्यवस्था भली भांति संभाली हुई है नई जगह सम्पूर्ण व्यवस्था एक सिरे से करनी होगी और इस समय तो वह अति व्यस्त है ,ए सी ए जैसी कम्पनी का उसकी कम्पनी में विलीनीकरण हो रहा है ,इस कार्य को पूर्णता देने में उसकी विशेष भूमिका है ।

दूसरे दिन वह कार्य पर गई तो उसका मन कार्य में पूरी तरह केन्द्रित नही हो पा रहा था ,उसे घर की चिन्ता थी । समर्थ ने उसे अनमनी देख कर कहा '' मिस सायना अगर आप अन्यथा न लें तो में आप की चिन्ता का कारण जान सकता हूं ?''

'' सायना ने अपनी समस्या उसे बताई,तो उसने चुटकी बजाते हुए कहा बस इतनी सी बात से ही आप इतनी परेशान हैं ?'' ''यह इतनी सी बात है?'' सायना ने चिढ़ते हुए कहा । समर्थ ने देखा कि सायना वास्तव में चिन्तित है तो हंसीं छोड़ कर उसने गंभीर हो कहा '' सायना तुम परेशान मत हो, आई प्रामिस कि मैं तुम्हारी पूरी सहायता करूंगा । यद्यपि समर्थ को आए कुछ ही समय हुआ था पर इतने

दिनों में ही वह सायना का अच्छा मित्र बन गया था । प्रत्येक कार्य को पूर्ण समर्पण और गंभीरता से करता था कम्पनी के सी ई ओ भी उस पर भरोसा करते थे

डूबते को तिनके का सहारा, सायना को भी एक आशा जगी कि हो सकता है समर्थ कुछ सहायता कर सके ।समर्थ ने घर ढूंढने में एड़ी चोटी का प्रयास किया पर फिर भी इतने अल्प समय में कोई प्रबंध नही हो पाया । अन्त में समर्थ ने हिचकते हुए कहा '' सायना इफ यू डोंट माइंड तुम मेरे साथ रह सकती हो ,वैसे भी मेरे फलैट में एक बेड रूम सेट बन्द ही पड़ा रहता है ''।पहले तो सायना ने मना कर दिया । उसे तो किसी के साथ रहने की आदत ही नही थी वह भला समर्थ के साथ कैसे निभा पाएगी ? पर घर खाली करने का दिन आ गया और उसके पर्याप्त पापड़ बेलने पर भी उसकी आशा के अनुकूल घर न मिला । कहीं नौकर मिलने में समस्या थी, तो कहीं आस पड़ोस मन का नही था इन दो चार दिनों के अनुभवों के पश्चात सायना को यही अधिक सुविधा जनक लगा कि वह समर्थ के साथ ही रहे , समर्थ के साथ रहने का अर्थ था उसकी प्रत्येक समस्या का पलक झपकते समाधन

फिर एक बात और थी । सायना ने इधर अनुभव किया था कि समर्थ का साथ उसे सुखद अनुभूति देता था । घर ढूंढने के लिये वह प्राय: संध्या को साथ साथ घूमते ।अब सायना ने ध्यान दिया कि कार्य क्षेत्र के बाहर समर्र्थका एक अलग ही रूप है वह साथ चलता है तो सायना की छोटी छोटी आवश्यकताओं का उसे ध्यान रहता है, पता नही क्यों वह उसके साथ स्वयंको निश्चिंत अनुभव करती है और सबसे विशेष बात जो सायना ने अनुभव की वह यह कि कहां अचल,शलभ,मोंटू उसके आगे पीछे घूमते रहते हैं ,पर समर्थ उसका ध्यान तो रखता है पर कभी उसके प्रति कोई विशेष रूचि नही प्रदर्शित करता । सायना जैसी सर्वगुण सम्पन्न सफल युवती के लिये तो यह उपेक्षा उसका अपमान था ,पर यह विचित्र ही था कि उसकी इसी विमुखता के प्रति सायना आकर्षित होती जा रही थी ।

संभवत: यही कारण था कि थोड़ी सी न नुकुर के पश्चात वह अपना सामान उठा कर समर्थ के घर पर ही आ गई ।समर्थ का फलैट सुव्यवस्थित था उसकी बाई खाना बनाती थी ,सफाई करती थी,उसका चौकीदार कुछ पैसे देने पर कपड़े पास की लांड्री में धुलवा और प्रेस करवा देता था ।घर की आवश्यकता का सामान डिपार्टमेंटल स्टोर से फोन करने पर घर पर आ जाता था । प्रात: सायना और समर्थ एक ही कार से निकलते कभी सायना अपनी कार निकाल लेती तो कभी समर्थ अपनी । संध्या को यूं तो दोनो नौ से पहले नही लौटते पर साप्ताहांत में वे पूरी रात पार्टी करते या घूमते फिरते ।महानगर की अति व्यस्त जीवन शैली में किसी के पास इतना समय न था कि उनके निजी जीवन में अधिक ताकझांक कर पाता । यह तो फुर्सत में बैठे लोगों का उत्तर दायित्व होता है कि समाज के चरित्र का संरक्षण करें । वैसे भी समरथ को नही दोष गुसांईं ।सफल और आत्म निर्भर व्यक्ति का कौन सा आप के सहारे हुक्का पानी पर चल रहा होता है जो आप उसे बन्द करने की धमकी दें ।हां दोनो के परिवारों ने अवश्य विरोध किया , । सायना के ममा पापा उसके इस निर्णय से नाराज हो गए थे ,उन्होने उसे समाज की उंच नीच समझाई पर उसका निश्चय अंगद का पांव सिध्द हुआ ।उन्होने आंसू बहाए अंतिम अस्त्र के रूप में संबध तोड़ने की धमकी भी दे डाली पर निजी स्वतंत्रता के लिये उन्हे कोई भी मूल्य स्वीकार्य था। उनका तो एक ही नारा था ये मेरी लाइफ है। अंतत: अपने संस्कारों में जकड़े ममा पापा और सायना की राहें भिन्न दिशाओं में मुड़ गईं ।

इतनी निकटता ने मन व तन दोनो की दूरियां मिटा दीं ।उनका जीवन उनकी इच्छा के अनुसार चल रहा था ,दोनो की निजता अक्षुष्ण थी, कौन कहां जाता है किसके साथ जाता है इस विषय में कोई हस्तक्षेप नही करता था ।दोनो में एक अनकहा समझौता था ,वह एक दूसरे के जीवन में इतना ही हस्तक्षेप करते जितना दूसरा चाहता था । सायना को आज सब कुछ वह मिला हुआ था जो वह चाहती थी ।जब तक समर्थ के साथ उसे अच्छा लगेगा रहेगी ,नही तो अलग हो जाएगी कम से कम पूरे जीवन निभे या न निभे साथ रहने का बंधन तो नही है न ? ,ममा पापा के विछोह की कसक उसके मन में एकान्त में प्राय: दस्तक दे ही देती थी ,पर वह अपने प्राप्य के मद में उसे धूल की भांति झटक देती ।

सायना डाक्टर की क्लीनिक के बाहर इधर से उधर चक्कर लगा रही
थी ।अंतत: उसकी बारी आ ही गई ।अंदर जाने पर डाक्टर ने उसी बात की पुष्टि की जिसकी उसे आशंका थी ,उसके नितान्त निजी जीवन में हलचल मचाने के लिये उसके शरीर में एक आस्तित्व का आगमन हो गया था ।यूं तो उसने पर्याप्त सावधानी रखी थी पर फिर भी न जाने कहां चूक हो गई। वह तो इतनी निश्चिंत थी कि प्रारम्भ में उसने परवाह ही नही की और आज जब उसने छुटकारा पाना चाहा तो देर हो चुकी थी ,डाक्टर ने उसे स्पष्ट रूप से मना कर दिया था। समर्थ और उसके मध्य पहले ही तय था कि वह केवल लिव इन पार्टनर हैं और ऐसे में बच्चे का कोई स्थान उनकी योजना में नही था ।

सायना घर आ कर बिस्तर पर ढह गई । अब वह क्या करे इस बच्चे को जन्म तो देना ही था ।क्षण भर को उसके मन में विचार आया ,तो क्या उसके लिये मुझे अपनी स्वतंत्रता से समझौता करना होगा ?नही नही वह यह नही कर सकती वह किसी बंधन में बंधने वाली नही है । वह तो स्वयं ही इतनी सक्षम है , यह बच्चा केवल उसका होगा, वह उसे अपना नाम देगी ,अब वह दिन नही रहे कि पिता के नाम देना आवश्यक हो, अब तो कानून ने भी मां के नाम को भी मान्यता दे दी है । सायना ने निश्चय कर लिया कि वह बच्चे को जन्म देगी और एकाकी ही पालेगी।

समय के साथ एक अद्भुत अनुभूति उसके अंदर सिर उठा रही थी ,एक नन्हे भोले से अपने ही अंश की कल्पना मात्र उसे रोमांचित कर देती । उसके जैसी बिंदास युवती को जीवन में संभवत: प्रथम बार स्वास्थ्य और पौष्टिक भोजन खाने की चिन्ता हुई, अन्यथा मम्मी बचपन से उस पर प्रत्येक हथकंडे अपना कर हार गईं पर उसे दूध फल का महत्व न समझा पाईं। उस शनिवार तो अति हो गई जब समर्थ ने उसे डिस्को चलने को कहा तो उसने मना कर दिया ,समर्थ ने उसे ऐसे देखा मानों उसकी सामान्यता को परख रहा हो ,यह वही सायना है जिसे शनिवार की रात तो घर में कोई रोक ही नही सकता था ।
अभी कल ही तो बेबी केयर की पुस्तक में उसने पढ़ा था कि मां का रात देर तक जगना बच्चे के स्वास्थ्य के लिये हानि कारक है,फिर वह कैसे डिस्को में रात व्यतीत करती ।जीवन में उसने प्रथम बार भोर के सूर्य के दर्शन किये थे,उसने पढ़ जो लिया था कि सवेरे टहलना स्वास्थ्य वर्धक है ।वह नवागंतुक न जाने कौन सा जादूगर था जिसने जादू की ऐसी तूलिका फेरी कि सायना सायना न रही ़न जाने कितनी बेड़ियां उसके पावों में पड़ती जा रही र्थीं और वह उन्हे प्रसन्नता से आत्मसात करती जा रही थी ।

तीन दिन हो गए थे सायना की काम वाली बिना बताए ही बैठ गई थी ।सायना का पूरी कार्य प्रणाली ही अवरूध्द हो गयी थी ,सायना को तो यह भी नही पता था कि चाय और चीनी कहां है , ऐसा नही है कि पहले कभी बाई ने छुट्टी नही ली थी पर तब और अब में बहुत अंतर आ चुका था ।तब तो वह ऐसे अवसर पर बाहर ही डिनर और लंच ले लेती थी पर अब उसे सुबह दूध लेना होता ,अंकुरित दाल और फल लेने होते ऐसे में बाई के न आने से उसे स्वयं ही सब करना पड़ रहा था । तीन दिन बाद बाई आई तो सायना बरस पड़ी '' तुम कहां चली गई थी, जानती नही इस समय तुम्हारा रहना कितना जरूरी है ''उसकी इस डांट पर बाई ने अपनी पीठ खोल कर दिखा दी ,उस पर पड़े मार के चिन्ह स्वयं ही अपनी कहानी कह रहे थे । सायना स्तब्ध हो गई ,वह सोच भी नही सकती थी कि कोई इतना कूर हो सकता है उसने पूछा ''यह किसने किया ''तो बाई ने बताया '' अरे मेम साब हमरा मरद ननकू है न उहै पी कर हमरी यह हालत करे है '',सायना ने आक्रोश से कहा '' तू क्यों उस निर्दयी व्यक्ति के साथ रह रही है खुद कमाती है अलग रह ले ''

इस पर बाई ने कहा '' मेम साब ऐसा नही है कि हम इस बारे में सोचे नही हमरे समाज में तो ई हुआ करता है पर उस चण्डाल में एक खास बात है कि वह हमे लाख मार ले पर अपने बिटवा को जान से जादा चाहे है बिटवा भी बाप के बिना न सोवे है ऐसे में हम ऊकर बाप कैसे छुड़वा दें अरे थोड़ा मारत ही तो है ,अपनी औलाद के लिये क्या हम यह भी नही सह सकते.'' फिर अपनी रौ में ही बोली '' भगवान ने औरत मरद एही लिये बनाया है कि बच्चे को मा और बाप दोनो चाही वर्ना उपर वाला चाहता तो क्या नही कर सकता ,बिना मरद के ही औरत मां बन जाती '' बाई तो कह कर अपने काम में व्यस्त हो गई पर अन्जाने ही जो गूढ़ तथ्य वह कह गई उसने सायना को झझकोर दिया ।

आज पहली बार वह स्वयं को उस अनपढ़ बाई के समक्ष क्षुद्र अनुभव कर रही थी वह इतनी मार तक अपने बच्चे को पिता देने के लिये सह रही थी और वह मात्र अपनी स्वतंत्रता के लिये उस नन्हे मुन्ने को ,जिसे वह सब कुछ देने के सार्मथ्य का दर्प करती है, उसके मौलिक अधिकारों से ही वंचित कर रही है, '' ममा सबके पापा हैं,मेरे कहां हैं। मां मुझे पापा चाहिये ।

मां तुमने अपनी स्वतंत्रता के लिये मुझे पापा नही दिये ।

ममा तुम स्वार्थी हो । ''

सायना को लगा उसके चारों ओर से आने वाले की निरीह ध्वनि प्रतिध्वनित हो रही है ।

''नही नहीं। ''कह कर वह खड़ी हो गयी ।

उसके मन में अनेक प्रश्न सिर उठा रहे थे।क़ल को बच्चा बड़ा होगा तो क्या उसे पापा की आवश्यकता नही होगी यदि उससे कोई कहता कि ममा या पापा में से एक को चुन लो तो वह एक के साथ रहना पसंद करती ? वह तो पैरेंट टीचर मीटिंग में भी हठ करके दोनो को बुलाती थी ।फिर उसे क्या अधिकार है उस आगन्तुक को उसके पापा से वंचित करने का तो क्या इसके लिये उसे जीवन के वे सारे बंधन स्वीकार करने होंगे जिनको वह नकारती आई है ।सायना अंत'र्द्वन्द में उलझती जा रही थी,अचानक सायना उठ बैठी ।उसने सम्पूर्ण संसार का सामना कर लिया था पर उस आने वाले के आरोपों की संभावना ने ही उसे झझकोर दिया ।आज उसे अनुभव हो रहा था कि अब यह लाइफ मात्र उसकी नही है और वह सोच रही थी कि आज ही समर्थ से विवाह के विषय में बात करनी होगी।

24/08:

Category: General
Posted by: Sushil Bansal
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Posted by: Sushil Bansal
भाग तो शन्नो भी रही है और बेतहाशा भाग रही है।

शन्नो के अंग अंग में वेदना की लहरें मरोड लेने लगीं। जख्मों पर पडे ख़ुरंट उखडने लगे। विधवा, बीमार सास और दो बच्चों के साथ उसे छोड सुभाष एक दिन चुपचाप भाग गया। पाँच साल उसने उनकी कोई खोज खबर नहीं ली। तीन महीने बाद बच्चों की सालाना फीस जमा करने जब बैंक से रूपये निकालने गई तो पाया सुभाष खाता झाड पौंछ गया था। इस बीच सास उसे खूब जली कटी सुनाती रही। हमेशा अपने भगोडे बेटे को बेकसूर और उसे कसूरवार ठहराया। हालांकि वह जानती थी कि उसका बेटा हद दर्जे का खुदगर्ज़ रहा है। पहले भी उसने उन्हें कम दुख नहीं दिये। किशोरावस्था में एक बार देशाटन के लिये उनके कंगन ले उडा था। न चिट्ठी न पत्री रोते रोते उनकी आँखों में रोहे उभर आए थे। दो साल बाद आया तो जैसे कुछ हुआ ही नहीं। चाँद से बेटे को सही सलामत देख, सारे दु:ख दर्द भूल गई। फटाफट रामकली की सुन्दरी भतीजी शन्नो से ब्याह दिया। सोचा नकेल पडते ही लडक़ा सुधर जायेगा।

सुभाष सुधरने के लिये इस धरती पर नहीं आया था। काम धाम कुछ नहीं दुश्मन अनाज का। जल्दी ही दो जुडवां बच्चों को बीवी की कोख में डाल दिया। मन वही का वही बनजारा। वह कब रुकने लगा। कपडों की आलमारी में एक नोट छोड ग़या विदेश जा रहा हूँ बस। शन्नो को काठ मार गया। अडोस पडोस वालों ने शन्नो के सामने सुभाष की जन्म पत्री बांच दी। शन्नो ने माथा पीट लिया। शन्नो की सास ने बेटे को तो दोष नहीं दिया उलटे बहू को ही कोसने लगी, मरी अगर उसको खुश रखती तो भला वह छोड क़र ही क्यों जाता? दान दहेज का मोह छोड, ख़ूबसूरती देख सिर्फ दो जोडे में ब्याह लाई थी। पास पडौस में घर की बेइज्ज़ती न हो इसलिये शन्नो चुप लगा जाती। बुढिया बेटे के इंतजार में एक दिन सुबह सुबह सूर्य को अर्ध्य देते देते छत से जो गिरी तो फिर उठ ही नहीं पाई।

सास के क्रिया कर्म में काफी रुपया पैसा खर्च हो गया। हाथ खाली पा शन्नो बौखला गई। किरायेदार ने किराया बढाने से साफ इनकार कर दिया। बचत के नाम पर बैंक में दस हजार की एफ डी आर बस। इन पैसों में अब काम चलने वाला नहीं, शन्नो ने सोचा। घर से जरा दूर आर्य समाज कन्या पाठशाला थी। उसी में नौकरी पाने के लिये एक दिन वह स्कूल के संस्थापक आनन्द बाबू के घर गई।

गोरी चिकनी शन्नो की लम्बी काठी, सुगठित देह और लाचारगी आनन्द बाबू से देखी न गई। उसके अस्तव्यस्त जीवन को संवारने के लिये उन्होंने उसके घर आना जाना शुरु कर दिया। व्यवहार कुशल आनन्द बाबू जब भी घर आते बच्चों के लिये अच्छी अच्छी मिठाई और नये नये उपहार ले आते। जनम के भूखे प्यासे सोनू और मोनू के जीवन में हरियाली आ गई। आनन्द बाबू बिना किसी टेन्ट्रम के टीन एजर बच्चों के चहेते अंकल आनन्द बन गये। सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था। सोनू मोनू इंग्लिश और मैथ्स की टयूशन लेने आज़ादनगर गये हुए थे। आनन्द बाबू भी अपना काम निबटा घर जा चुके थे। शन्नो बचा हुआ खाना फ्रिज में रख कर बिस्तर की चादर बदल रही थी। तभी दरवाजे क़ी घण्टी बजी।

तकिया हाथ में लिये लिये उसने दरवाजा खोला। कोट पैन्ट पहने, कन्धे पर बैग लटकाये, सिर पर बोला हैट लगाये, मुंह में चुरुट दबाये, चमाचम जूता पहने, गोरा चिट्टा सुभाष का रूप धरे कोई अंग्रेज साहब..थोडी देर संज्ञा शून्य खडी, वह सामने खडे फ़िल्मी अदा से मुस्कुराते सुभाष को देखती रही फिर हकलाती हुई, घबराई सी बोली, '' क...कौन सुभाष तुम! ''

'' हाँ हाँ मैं ही हूँ....मेरा भूत नहीं, छूकर देख ले।'' सुभाष ने उसके लम्बे बालों को दोनों हाथों में फंसा कर जोर से उसे अपनी ओर खींचा। फिर चेहरे, गले और गले के नीचे गदराये उभार को होंठों से रगडते हुए उसे बांहों में भर कर यहाँ वहाँ इस तरह सहलाया दबाया कि उसकी नस नस में बिजली तडक़ उठी। शन्नो को लगा कि सुभाष पहले से कहीं और गोरा, लम्बा, तंदुरुस्त और रंगीला हो गया है।

'' है...है क्या करता है...बच्चे तेरह साल के हो गये हैं। तुझे शर्म नहीं आती।'' उसने उलाहना देने की कोशिश की। पर सुभाष की गर्म सांसे, चुलबुलाते हाथ, उसके बदन के हर हिस्से में घुंघरु बजाने लगे। '' तेरह साल के हो गये तो शर्म काहे की। उन्हें नहीं पता क्या कि मैं उनका बाप हूँ। साले आये कहाँ से हैं, यहीं से न! '' उसने उंगली कोंचते हुए कहा। ''बाप के कौनसे फर्ज निभाए हैं तूने सुभाष'' सुभाष उसको बोलने दे तब न। वह तो उसके बदन में इस तरह बिजलियां भरता चला जा रहा था कि वह अपनी लालची देह और उसकी चुगलियों के आगे लाचार हाती चली गयी।

मीठी मीठी बातों और इंग्लैण्ड से लाये ढेर सारे कीमती उपहारों से उसे सोनू मोनू और शन्नो को अपने बस में करने में देर नहीं लगी। सुभाष रात भर बैठा शन्नो और बच्चों से तरह तरह की अच्छी बातें करता रहा। किसी को कोई गिला शिकवा करने का मौका ही नहीं दिया। सुभाष ने मां के मरने का कोई दुख नहीं किया। दो महीने के अन्दर सब कुछ बेच बाच कर सोनू मोनू और शन्नो को लेकर लन्दन चलने की प्लानिंग करने लगा।

शन्नो का मन सशोपंज में था। पर उसके पास कोई चारा भी न था। सुभाष की ब्याहता थी। सुभाष के लापता होने के कारण वैसे ही लोगों के मन में उसके प्रति कोई इज्ज़त हमदर्दी नहीं थी। यहाँ वहाँ आनन्द बाबू को लेकर पीठ पीछे होते भद्दे इशारों से वह पहले ही लहूलुहान पडी थी। यहाँ रहने पर सोनू मोनू के पढाई लिखाई और शादी ब्याह में आने वाली समस्याओं और खर्चों के बारे में सोच कर वह जाने के लिये राजी हो गई। औरत और फिर हाई स्कूल में आर्ट टीचर! उसकी इज्ज़त और तनखाह ही कितनी थी? क्या कर लेगी वह अपने बूते पर? उसने अपने बौनेपन को कोसा।

जाते समय भी आनन्द बाबू ने बहुत मदद की। इंदिरा गांधी एयरपोर्ट तक उसे छोडने गये। सोनू मोनू बहुत एक्साईटेड थे। शन्नो जरूर दुखी थी। अन्दर अन्दर आनन्द बाबू भी खाली खाली और उदास महसूस कर रहे थे। इतने दिनों का साथ था। जैसे जैसे जाने का दिन करीब आता। शन्नो का संशय गहराता जाता था। सुभाष का क्या भरोसा? इतने सपने दिखा कर ले जा रहा है। एक पल नहीं लगेगा उसे तोडने में। पर उसके हाथ में क्या है? वह कर भी क्या सकती है? आगे पीछे सहारा देने वाला कोई नहीं है। चाची ने शादी के बाद मुडक़र देखा भी नहीं। जाने कौनसे तीरथ गई कि फिर लौटी ही नहीं। आनन्द बाबू ने कई बार गीली आंखों से उसे और सोनू मोनू को देखा। क्या पता कैसा भविष्य उसका इंतजार कर रहा है। न मालूम सुभाष कौन सा गुल खिलाए। परदेस में आनन्द बाबू जैसा दोस्त और रहनुमा कहाँ मिलेगा। वह आनन्द बाबू से अच्छी तरह विदा भी तो नहीं ले पाई। सारे टाईम पासपोर्ट, वीसा टिकट और एन्ट्री क्लियरेन्स के लिये चक्कर लगते रहे।

जब भी बातचीत का मौका मिलता सुभाष बस लंदन के गीत गाता। वहाँ की सडक़ें शीशे सी चमकती हैं। रोशनी इतनी तेज होती है। सब कुछ ऐसा साफ सुथरा कि कुछ पूछो मत। सारे दिन घूमते रहो। मन करे तो खाना बनाओ, न मन करे टेक अवे ले लो। न झाडू लगाना, न कपडे धोना। सब काम मशीनों से होता है। वह सोचती सब कुछ मशीन से होता है तो एक दिन हम भी मशीन हो जाएंगे।

'' यहाँ जैसा सूखा वहाँ कहीं नहीं मिलेगा।'' सडक़ के दोनों ओर लगे मरघिल्ले पेडों की ओर देखते हुए उसने कहा।
'' ऐसी हरियाली, ऐसी खूबसूरती कि बस देखते रह जाओ।पैसा भी खूब है। बच्चों की पढाई फोकट में, मकान फोकट में, दवा फोकट में, नौकरी नहीं तो सरकार पैसे देगी। आराम ही आराम है वहाँ। वहाँ तो भिखमंगे भी कोट पहनते हैं।''

शन्नो को आधी बातें समझ में आती आधी नहीं। बच्चे जरूर अंग्रेजी फिल्मों, गानों और कपडों के बारे में पूछते रहते। रह रह कर शन्नो के हाथ पैर ठण्डे हो रहे थे। काश! आस पास कोई ऐसा होता जिससे वह कोई सलाह मशविरा ले सकती।

लंदन आने पर उसे बहुत बुरा नहीं लगा। सब चीजे साफ सुथरी। रोज बासमती राइस और चिकन खाओ। सफेद झकाझक आटे की रोटी। दूध दही इफरात। सुभाष डोल पर था। पर उससे क्या? हर हफ्ते मिनीस्ट्री ऑफ सोशल सिक्यूरिटी जाकर पैसे ले आता। बीवी बच्चों के आने से अलाउंस बढ ग़या था। बिजली, पानी, गैस सब सरकारी खाते में। दो तीन महीने में सजा सजाया काऊंसिल फ्लैट भी मिल गया। जिन्दगी आसान हो गई।

सोनू मोनू को वांडस्वर्थ के अर्नेस्ट बेवन स्कूल में बिना हील हुज्जत के दाखिला मिल गया। दोनों पढने में होशियार थे। बोलने चालने में थोडी दिक्कत हुई पर चार पांच महीने में सब ठीक ठाक हो गया। जल्दी ही नये परिवेश में घुलमिल गये। शुरु के दिनों में स्कूल के बच्चे उन दोनों को पाकी, डमडम और स्मैली माऊस कह कर चिढाते थे। टीचर मिस एलिस अच्छी और सहृदय थीं। एक बार पंजाब व गुजरात भी हो आईं थीं। उसने दोनों को बाईलिंगुएल हैल्प लगा दी। मेहनती बच्चे थोडे ही दिन में टॉप लिस्ट में आ गये। सोनू और मोनू की रुचियां आपस में मिलती तो थीं पर दोनों की प्रवृत्तियां बिलकुल भिन्न थीं। सोनू को एक्टिंग और लिटरेचर पसन्द था। वह तेज तर्रार थी। तो लैडबैक मोनू सैलानी तबियत का, किताबी कीडा, फिलॉसफर और कम बोलने वाला।

सुभाष की चाल वही बेढंगी। हनीमून बस साल दो साल ही चला। उसने रात को मिनी कैब चलाने का धंधा अपना लिया। कभी घर आया, कभी नहीं आया। जब भी वह घर आता शन्नो उससे झगडा करते हुए जवाब तलब किया करती। सुभाष बगैर झगडा किये बिना हील हुज्जत के कहता -

'' डोल के पैसे पूरे नहीं पडते। बच्चों की जरूरतों में कोई कमी नहीं होनी चाहिये इसलिये रात को मून लाइटिंग करता हूँ।''
'' ये मूनलाइटिंग क्या होता है? मुझे चलाने की कोशिश मत करो। मैं तुम्हारी नस नस पहचानती हूँ।'' शन्नो हाथ पांव पटकती शेरनी सी गुर्राती। '' अरे! बीवी हो तो नस नस क्या रेशा रेशा पहचानोगी।'' वह उसे चिढाने के अन्दाज से व्यंग्य करता, '' रही मूनलाईटिंग की बात, वह है टैक्स से हेराफेरी यानि मैं मिनी कैब की कमाई पर टैक्स नहीं देता। और डोल पर भी रहता हूँ।'' शन्नो फुफकारती हुई उसके हाथों से पे पैकेट उठा लेती। पैसे बचते नहीं तो कम भी नहीं पडते। सुभाष जितना भी कमाता बिना किसी हील हुज्जत के उसे दे देता था। बच्चे भी पढाई लिखाई के साथ वीकेण्ड पर काम कर थोडा बहुत कमा कर अपने शौक पूरे कर लेते। शन्नो ने भी कई बार सोचा कि वह भी कुछ काम कर ले खाली बैठना उसे अच्छा नहीं लगता था। कई जगह उसने पूछताछ की। स्कूलों में मैथ्स और साईन्स की वेकेन्सी तो अकसर होती पर आर्ट टीचर की वेकेन्सी उसने आज तक नहीं देखी। फैक्टरी और सुपर मार्केट में काम करना उसे पसन्द नहीं था। वैसे भी सुभाष ने उसे काम करने के लिये कभी बढावा नहीं दिया सो या तो वह घर के काम करती या लाईब्रेरी से किताबें लाकर पढती। बाहर आने जाने की आदत छूटती जा रही थी।

सोनू मोनू पढाई के साथ साथ लन्दन की तेज और उनमुक्त हवा से खूब प्रभावित हो रहे थे। कुछ अजीबोगरीब लडक़े लडक़ियां उनके दोस्त बन गये थे। वीकेण्ड पर टेस्को और मार्क एण्ड स्पेन्सर में काम मिल गया। हाथ में पैसा आया तो हिम्मत भी बढी । बाहर घूमना फिरना, छुट्टियों में बैक पैक लाद कर हिचहाइकिंग करते हुए पर्यटन करना शुरु हो गया। दोनों जब भी कहीं जाते शन्नो के लिये कोई न कोई अच्छा सा गिफ्ट जरूर लाते। पर शन्नो को यह सब बेमानी लगता। वह बच्चों की असाधारण बहुमुखी प्रतिभा से अनजान उनसे, तालमेल नहीं बैठा पा रही थी।

सुभाष ज्यादातर बाहर ही रहता। अब जबसे सोनू मोनू यूनी गए हैं तो अकसर दोनों की शामें रैफरेन्स लाईब्रेरी में गुजरती। कई बार वो लोग टेम्पिंग भी कर लेते। अकसर खाना भी वहीं कैन्टीन में खा लेते। शन्नो दिनों दिन अकेली होती जा रही थी। उसे लगता वह एक दम फालतू हो गयी है। किसी को उसकी जरूरत नहीं है। शायद वह एक डोर मैट है जिसे जो चाहे पैरों तले रौंद दे।

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Posted by: Sushil Bansal
बेचारा। शाश्वत। सत्ताईस-अट्ठाइस का रहा होगा। अपने आनन्द से पाँच-छ: साल ही बडा था। देखो तो किस तरह चला गया। पता नही किस आशा से वशिष्ठ जी ने उसका नाम शाश्वत रखा होगा।

अवस्थी जी, शोक संदेश पर दृष्टि जमाते हुए बोले।

''सचमुच बहुत बुरा हुआ।''
अदिति कहने लगी - ''तेरही की तारीख तो निकल गई।''
''हाँ, शोक संदेश लेट मिला। समय पर मिलता तो भी उतनी दूर जाना संभव नही था। वशिष्ठ जी ने क्रिया कर्म अपने नेटिव प्लेस में किया हैं। मैं आज फोन लगाऊंगा। वशिष्ठ जी लौट आए होंगे तो हम उनसे मिलने चलेंगे।''
''मेरे ख्याल से वे लोग लौट आए होंगे। तुम फोन लगा ही लो।''
''यह ठीक हैं।''

अवस्थी जी ने अपनी कुर्सी पर बैठते हुए ही फोन को स्टूल सहित अपनी ओर खींचा और नम्बर घुमाने लगे। उधर वशिष्ठ जी ही मिले। संक्षिप्त बात हुई। दोनो पक्ष कुछ कहने की स्थिति मे नहीं थे। अवस्थी जी रिसीवर रखते हुए अदिति से बोले -

''वशिष्ठ जी आ गए हैं। दोपहर बाद चलते हैं। मैं फर्स्ट हाफ मे ऑफिस का काम निपटा लूंगा। हम फिर रात तक लौट भी आएंगे।''
''यह ठीक हैं। हमें जाना चाहिए। शाश्वत तीन लडक़ियों के बाद का था। निरूपा की पता नहीं क्या हालत हो रही होगी।''
''वे तो मां है। इतना बडा दुःख उनके लिए असहनीय होगा।''
''अब क्या कहें?''

निकलते-निकलते देर हो गई। अवस्थी जी एक बार कचहरी पहुंच जाएं तो फिर मुवक्किल आसानी से नही छोडते। माघ की सांझ पांच बजे ही ढल जाती हैं। अदिति और अवस्थी जी जब शहर की सीमा से बाहर आए अंधेरा, उजाले को तेजी से घेर चुका था। लांग रूट में अदिति ड्राइव करती थी। इसी बहाने उसका अभ्यास हो जाता था। शहर की भीड से दूर निकल अदिति ड्राइविंग सीट पर आ गई। अवस्थी जी दिन भर के थके थे और मानसिक रूप से अशांत भी। वो अदिति की सीट पर पहुँच कर रिलैक्स होने के लिए कुछ पसर कर बैठ गए। अवस्थी जी कार बहुत सतर्कता से चलाते हैं। फौजदारी और दीवानी के मुकदमे लडते हुए उन्हें कानून की धाराओं का विषद ज्ञान हैं और वो कार चलाते हुए प्रायः चिन्ताग्रस्त रहते हैं। दुर्घटना हुई तो कौन परिस्थितियों में कौन सी धारा लागू होगी।

''मजे-मजे से चलो। अवस्थी जी ने अदिति को सचेत किया।''
''मुझे मत सिखाओ। अब मैं कार अच्छी तरह चला लेती हूं। किसी दिन तुम्हे बैठाकर सिटी में चलाकर दिखाऊंगी।''
''कृपा करो। अभी तुम्हारी ड्राइविंग मे ऐसा परफेक्शन नहीं आया है जो भीड में चलाओ। वो सामने गङ्ढा देखा। उधर काटो। यहाँ सडक़ भले ही सूनी है पर हालत ऐसी खस्ता है कि दुर्घटना के पर्याप्त अवसर हैं।''

''दुर्घटना?'' शाश्वत सडक़ दुर्घटना मे ही तो गया हैं। अदिति दहल गई। कार चलाने के आनंद में कुछ देर के लिए भूल गई थी तीस किलोमीटर दूर कृपालपुर मातमपुर्सी के लिए जा रही हैं।

''प्लीज क़ुछ अच्छी बात करो। वैसे ही मन भारी है। दुर्घटना शब्द तो अब सचमुच डराने लगा है।''
''सामने देखो।'' अवस्थी जी ने कुछ और ही जवाब दिया।

दोनों एकाएक चुप हो गए। दोनो शाश्वत के बारे मे सोच रहे थे। अदिति का ध्यान जल्दी ही आनंद की ओर चला गया। मनुष्य के चित्त का कोई कोना सदैव अपने अति प्रिय के विषय मे सोचता रहता हैं। मनुष्य कदाचित हर क्षण स्वार्थी होता हैं। अपने कार्र्यव्यापार मे लीन। तभी तो अदिति शाश्वत के बहाने आनंद के बारे मे सोचने लगी। आनंद बाहर पढता है, बाइक तेज चलाता है इस समय वह कहां होगा? सडक़ पर तो नही? ईश्वर। आनंद पर कभी न बीते जो शाश्वत पर बीती। वह मेरी इकलौती संतान है। वह न होगा तो मेरे जीवन मे कुछ भी नही होगा।

अदिति को याद आया आनंद कहता है - ''मां मै कुछ बन जाऊं, तुम्हारे लिए कितने ठाट बिछा दूंगा।''
वह कहती है - ''तुम मिल गए अब मुझे कुछ नही चाहिए। आनंद, तुम हो इसलिए मेरी जिंदगी भरी पूरी है। तुम न होते तो जिंदगी कैसी होती मै सोच नही पाती। बच्चे प्रकृति का सबसे सुदंर पक्ष है।''
''तो फिर मेरा एहसान मानती हो न।'' आनंद हंस देता।
बदमाश।

ऐन सामने अंधा मोड। स्याह अंधेरे को और अधिक स्याह बनाता अंधा मोड। अवस्थी जी झपक गये थे और अदिति को यातायात के नियमों का अभ्यास नही था जो मोड से गुजरने से पूर्व हार्न बजाती। मोड पर तेज ग़ति और चुंधियाते प्रकाश वाली मोबाइक जैसे एकाएक ही प्रकट हो गई थी - क्षणांश में। अदिति को नही मालूम मोटरसाइकिल सवार ने हार्न दिया था या नहीं। वह राइट साइड पर था या नहीं। सवार कितने थे। उसे कुछ नही मालूम। उसका मस्तिष्क शून्य हो गया। उसे इतना भर मालूम है कि तेज टंकार हुई। उसकी आंखे मुंद गई और वह स्टीयरिंग पर झुक गई। अवस्थी जी के कंठ से घिघियाती-घिसटती सी चीख निकली और कार की घिसटती चिंचियार में विलीन हो गई। कार कुछ बहकती हुई सी मोड क़े इस पार से उस पर तक पहुंच गई। अदिति को यह भी स्मरण नही कार स्वत: रुक गई या उसने सायास रोकी। उस एक पल मे बहुत कुछ घट गया था पर उसे मालूम नहीं क्या घटा। वह पहली बार जान रही थी। हादसा इतनी तेज़ी से घटित होता हैं और उसे रोकने की गुंजाइश नही होती। भय, आतंक सदमे से स्तब्ध थी वह। उसने अनायास पीछे मुड क़र देखा पीछे अंधेरा था। मोटरसायकिल सवार नही दिख रहा था। वह हो सकता है अंधे मोड क़े उस पार कहीं गिरा होगा जिस पार से कार इस पार आ गई थी। कुछ दिखाई नही देता था। उसे कुछ समझ नही आ रहा था। अदिति की आक्रांत सांसें तीव्रतम गति से चल रही थी जैसे दमें के रोगी की सांस बढी हो।

'' क्या करती हो? यह पहला वाक्य था जो अवस्थी जी के घुटते गले से बाहर आया। कहने के साथ उन्होने भी पीछे मुडक़र देखा। सब कुछ अंधेरे में गुम।
कौन था वह? कहाँ गिरा? अदिति की आंखे फैलकर भयावह लग रही थीं।
तुम पागल हो। भूत सवार हैं गाडी सीखने का। इधर आओ और मुझे चलाने दो। कोई स्टार्टिंग ट्रबल आ गई होगी तो यहीं बैठी रहना। आसपास खेत हैं ख़ेतों मे कोई काम कर रहा होगा तो उसने हमें देख लिया होगा। पकडे ज़ायेंगे।

अवस्थी जी अपनी तरफ का गेट खोलकर ड्राइविंग सीट पर आ गए। अदिति को नहीं मालूम क्या हो रहा हैं और उसे क्या करना चाहिए। उसका तंत्रिकातंत्र या तो सुन्न हो गया था या उसे बाहरी शक्ति संचलित कर रही थी। अदिति थरथराते पैरों से सीट से उतर कर सडक़ पर खडी हो गई। उसकी देह में इस तरह थरथराहट भरी थी जैसे अभी-अभी शॉक थेरेपी दी गई हैं।

''कौन था? कहाँ गिरा?'' अदिति ने फिर दोहराया। स्वर ठीक तरह खुल नही रहा था।
'' चुप रहो और जल्दी बैठो। आज तुम्हारी बेवकूफी ने।''

अवस्थी जी एक क्षण भी दुर्घटनास्थल पर रुकना नहीं चाहते थे। वे चाभी घुमाकर कार स्टार्ट करने का प्रयास करने लगे। अदिति इधर की सीट पर आ कर बोली -

''देखो ना जाकर उसका क्या हुआ?''
तुम जाओ और पुलिस, कचहरी के फेर में पडो। तुम्हारा अभी लाइसेंस तक नही बना हैं। बिना लाइसेंस गाडी चलाना अपराध हैं। होश की बातें सोचो।

अवस्थी जी की वकील बुध्दि सजग हो रही हैं। गाडी स्टार्ट हो गई। उस असहनीय घबराहट में उन्होने राहत की सांस ली कि कार मे स्टार्टिंग ट्रबुल नही आई। उन्होने कार बढा दी। एक बार दाहिने-बाएं, पीछे देखा। कहीं कोई नही था अंधेंरा ही अंधेरा। वे खुद को ढाढस देने लगे, उन्हे किसी ने नहीं देखा है। इस अंधेरे और शीत के कारण बढ ग़ई गलन मे खेतों में प्राण देने के लिए कोई नहीं बैठा होगा। उन्हे अंधेरा इस समय वरदान की भांति लग रहा था। अंधेरा न होता तो ना जाने कितने अपराध रोज उजागर होते।

''वह कौन था? कहां गिरा?'' अदिति शायद अब जिंदगी भर यही दोहराती रहेगी।
''सदमे मे तुम्हारा दिमाग तो खराब नही हो गया अदिति?'' एक ही बात रटे जा रही हो। अब अवस्थी जी की आवाज स्पष्ट रूप से खुली और वे डपटते हुए बोले।
''हमें उनकी मदद करनी चहिए।''
''जरूर। मदद करें और वह होश में हो तो तुम्हें पहचान ले। कार तुम चला रही थी और तुम्हारे पास लाइसेंस नही है। इसका मतलब जानती हो तुम? अटैम्पट् टू मर्डर।''

अवस्थी जी अटैम्पट् टू मर्डर जैसा झूठ बोलकर अदिति को संभवत: भयभीत करना चाहते थे ताकि वो चोटिल की सहायता करने का हठ न करे।

''मर्डर? हे भगवान।'' अदिति भय से एकदम निरुपाय लगने लगी। वह असहनीय बेचैनी और घबराहट से त्रस्त थी - ''सुनो मुझे कही नहीं जाना। मुझे पता नहीं कैसा लग रहा है। मैं परेशान हूं और वहां एडजस्ट नहीं हो सकूंगी। घर वापस चलो। हम वशिष्टजी के यहां कल चले जायेगे। मानो मेरी बात।''
''अदिति चुप रहोगी? मै भी तुम्हारी तरह परेशान हूं और तुम मेरी परेशानी बढा रही हो। मुझे कुछ सोचने दो। हम उसी रास्ते पर वापस लौटें और पकडे ज़ाएं। आसपास खेत थे और हो सकता है कि खेतों में आदमी रहे हों। हो सकता है उन्होने हमें देख लिया हो। हो सकता है वे लोग इस वक्त मोटरसायकिल वाले के पास हो और हमें और कार को पहचान लें। यह भी संभव है मोबाइक वाले को विशेष चोट न आई हो और वह चला गया हो और हम यहां परेशान हैं। तुम्हारा जे ये चेहरा जो पसीना-पसीना हो रहा है, उसे संभालो। तुम्हारे चेहरे से लग रहा है तुमने कुछ गलत किया हुआ है।''

अवस्थी जी की वकील बुध्दि सभी बिन्दुओं को खंगाल रही है। वे अदिति को सामान्य बनाने की कोशिश कर रहे थे और अदिति का भय बढता जा रहा था। अवस्थी जी ने उसके चेहरे को लक्ष्य किया तो वह घबराहट से रुमाल से अपना चेहरा पोंछने लगी। जैसे पोंछने मात्र से चेहरे के भाव मिट जायेगें और चेहरा भय मुक्त, स्वाभाविक लगने लगेगा। अदिति को अब भी विश्वास नहीं हो रहा था दुर्घटना उससे हुई है। वह नहीं समझ पा रही थी अवस्थी जी ऐसे असंवेदनशील क्यो हो रहे है। उसे याद आया एक बार अवस्थी जी कार चला रहे थे और सामने से साइकिल पर चले आ रहे स्कूल के विद्यार्थी को टक्कर मार दी थी। कार धीमी थी। टक्कर घातक नहीं थी। लडक़ा साइकिल सहित एक ओर गिर गया था और फिर गणवेश की धूल झाडता हुआ उठ कर खडा भी हो गया था। अवस्थी जी ने कार से उतर कर लडक़े के दो थप्पड मार दिए थे - हीरो बनता है। तेरे बाप ने साइकिल चलाई है? गलती करेगा, मरेगा, परेशानी हमारी।

दुर्घटना का सदमा और सार्वजनिक स्थल पर मारे जाने का अपमान। लडक़ा कपोल पर हथेली रखकर सन्न खडा रह गया। लोग जुहाते इससे पहले ही अवस्थी जी शीघ्रता से कार बढा ले गए थे। अदिति को उनका आचरण खला था -

''यह क्या बात है?
तुम नहीं समझोगी। मैं लडक़े को नहीं मारता तो लोग चढ बैठते कि गलती मेरी है। हो सकता है प्रभावित लडक़े को र्दो चार सौ रुपये भी देने पड ज़ाते। पर आजकल यही होता है।

अवस्थी जी ऐसे अभिमान से बोले थे जैसे बहुत बुध्दिमता का काम किया है। अदिति सोचती रह गई थी कोई आदमी इतना असंवेदनशील कैसे हो सकता है? और आज। आज फिर अवस्थी जी ठीक वैसा आचरण कर रहे है। अदिति परेशान है। उस दिन तो लडक़ा बच गया था। आज उस मोटरसाइकिल वाले का पता नहीं क्या हुआ होगा? अदिति ने एक ठण्डी-गहरी उसांस भीतर खींचते हुए एक बार फिर रुमाल से चेहरा पोंछा। इधर अवस्थी जी कार की गति बढाने मे पूरी शक्ति झौंक रहे है फिर भी उन्हे लग रहा है कार आगे नहीं बढ रही है। अदिति के चेहरे की दशा देख सहसा उन्हे ख्याल आया की कार की दशा भी जांच लेनी चाहिए। कुछ टूट-फूट हुई होगी और ऐसी गाडी वशिष्ट जी के घर ले जाएंगे तो वह संदेह का कारण बनेगी। वे संदेह का कोई कारण छोडना नहीं चाहते थे। उन्होने माइल स्टोन पर नजर डाली। कृपालपुर दस किलोमीटर अर्थात वे बीस किलोमीटर की दूरी तय कर चुके है। अंधा मोड बहुत पीछे छूट गया है। अवस्थी जी ने कार रोकी - देख लें कुछ डेमेज तो नही हुआ? अदिति चुप रही। अवस्थी जी कार से उतरकर हेडलाइट के प्रकाश में कार का निरीक्षण करने लगे। सेफ्टी गार्ड लगा होने से बडी क्षति होने से बच गई थी। हेड लाइट के नीचे का पीला छोटा बल्ब फूट गया था और सामने का हिस्सा थोडा पिचक गया था। जितनी क्षति की आशंका थी उससे बहुत कम हुई थी। अवस्थी जी के लिए यह एक बडी राहत थी। वे पुन: आकर ड्राइविंग सीट पर बैठ गए।

''अदिति कुछ खास डेमेज नहीं हुआ है। इसका मतलब है टक्कर बहुत तेज नहीं हुई होगी। मुझे लगता है मोटर साइकिल वाले को झटका लगा होगा, वह बच गया होगा।''

कृपालपुर पहुंचकर अवस्थी जी ने वशिष्ट जी के घर से कुछ फासले पर एक छतनार पेड क़े नीचे कार खडी क़ी। यहां स्ट्रीट लाइट का प्रकाश भली प्रकार नहीं पहुंच रहा था और अपेक्षाकृत अंधेरा था। वे नहीं चाहते थे कि किसी की नजर कार पर पडे और वह कुछ सवाल करे। उनकी वकील बुध्दि कभी इस विलक्षण ढंग से चौकन्नी होगी उन्हे नहीं मालूम था।

''अदिति प्लीज नार्मल हो जाओ।'' अवस्थी जी ने वशिष्ट जी के गेट के भीतर प्रविष्ट होते हुए कहा। जवाब में अदिति ने फिर चेहरा पोंछा। वशिष्ट जी का घर अप्रत्याशित रूप से शांत और करुण प्रतीत होता था। अपने प्रिय की मौत से पदार्थ भी दरकता होगा तभी तो मकान वीरान लगने लगता है। आज बाहर बगीचे की लाइट बुझी हुई थी। लाइट जलाने की किसी को सुध नहीं रही होगी। इस घर के लोगो को अपनी ही सुध नहीं होगी लाइट जलाने की क्या कहे? वशिष्ट जी के घर को देख अदिति की आंखे भर आई। रास्ते का हादसा और शाश्वत की मौत। अदिति बहुत देर से चाह रही थी रो ले पर रुदन भी जैसे संघात से ठिठका हुआ था। अब वह खुद को रोके नहीं रख सकती थी। अदिति जब भी इस घर में आती थी और शाश्वत घर पर होता था तो वही सबसे पहले बाहर निकलकर उसके पैर छुता था।

वह कहती, ''खुश रहो।''
''एक आशीर्वाद से क्या होता है यहां तो बहुत से आशीर्वाद चाहिए। शाश्वत विहंसते हुए कहता।''
''जैसे? ''
''जैसे। जैसे। आई आई टी में हाइयेस्ट परसेंटेज। फिर अच्छा सा जॉब - ख़ूब ढेर सारा पैसा। हां एक सेन्ट्रो भी चाहिए और एक अच्छी सी लडक़ी भी चाहिए।''
''बदमाश।''
''आपके जैसी।'' शाश्वत का हंसना देर तक चलता।

निरुपा कहती - ''यह बॉम्बे चला जाता है और इसकी हंसी यहीं मेरे पास रह जाती है।'' शाश्वत की हंसी के बिना यह घर कैसे टिका रह सकेगा? आज शाश्वत स्वागत के लिए बाहर नहीं आया। कोई भी नहीं आया। अदिति और अवस्थी जी सामने के बडे क़मरे मे चले आए। वशिष्ट जी और निरुपा इसी कमरे में मिल गए। अदिति ने जिस दिन से शाश्वत के न रहने की खबर सुनी है तब से पीडित है पर इस समय शाश्वत के घर आ कर लग रहा है सब कुछ आज ही अभीअभी घटा है। कोने में स्टूल पर शाश्वत की बडी सी तस्वीर
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Posted by: Sushil Bansal
तीज त्योहार पर जब बडी दीदी दिल्ली मायके आतीं तो उनको और उनके दोनो बच्चों के, और जीजा जी के ठाठ देखते ही बनते। उस समय विनीता दीदी भी आती थीं। वह भी मुझसे 8 साल बडी थी। मेरे मंझले जीजा जी भी एक बडी अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनी में बहुत ऊंचे पद पर थे। अच्छा बंगला रहना पहिनना ओढना। पर एक तो बडे शहर का रहना और फिर एक बंधी हुयी आमदनी, विनीता दीदी सुनीता दीदी का सामना कहां कर सकतीं थीं।

सुनीता दीदी मंहगी साडियों गहनों से लदी रहतीं।बात बात पर नोटों का ढेर निकाल लेती। बच्चों ने कुछ फरमायश की और चीज हाजिर।शॉपिंग का ऐसा तांता लगता कि रूकने का नाम ही ना लेता।

हम लोगों का सम्पन्न परिवार था।अंग्रेज लोगों के समय का मेरे दादा रायसाहव अजुदिया नाथ का दिल्ली में माल रोड पर बंगला। तुर्रीदार पगडी पहने दरबान तो नहीं थे पर लोहे के बडे ग़ेट आठ फुट ऊंची छत बाले रोशनदान वाले फैले हुये कमरे और ऊंचे ऊंचे दरवाजे अपनी भव्यता की कहानी कहते थे। मेरी मां एक दीवान परिवार से थीं। अपने जमाने की अनिन्द्य सुन्दरी। बेटियां एक से एक खूबसूरत। उनको सर्वश्रेष्ठ शिक्षा दीक्षा दी गयी थी। मेरी दोनों बडी बहिनों को अच्छे घरों में ब्याहने में तनिक भी दिक्कत नहीं हुयी थी।

इकलौते भाई ने घर का व्यवसाय संभाल लिया था।उसका विवाह दिल्ली के ही एक जाने माने व्यावसायिक परिवार में हुआ था। रजनी भाभी बहुत खुशमिजाज और मिलनसार थीं।वह मुझे खूब चाहतीं थीं।मैं सुख सुबिधा में पली बढी हुयी थी।पर सुनीता दीदी का वैभव देख कर तो मेरी आंखें भी चकाचौंध हो जाती थीं।

रजनी भाभी तो सुनीता दीदी और जीजा जी से बहुत प्रभावित थीं।

मुझ को ले कर वह कहतीं थीं '' मैं तो अपनी सुमन का ब्याह लाला जी जैसे इन्जीनियर से ही करूंगी''।

मेरे लिये इंजीनियर ढूंढने में परेशानी नहीं हुयी। मैं सब बहिनों में खूबसूरत और स्मार्ट समझी जाती थी। शास्त्रीय नृत्य संगीत में पारंगत थी। मंच पर कार्यक्रम देती रहती थी।

सम्बन्ध बडी दीदी ने ही सुझाया था।जीजा जी के विभाग में सहायक इंजीनियर था।देखने में अच्छा ऊंचा लम्बा और जीजा जी के अनुसार बडा होनहार।सब लोगों की रजामंदी हो गयी थी।मुझे भी राजन पसंद आया था। मेरे हां भर कहने की देर थी कि सम्बन्ध औपचारिक रूप से तय।मैं शादी से अभी दूर रहना चाहती थी। मेरा गरमियों में एक भव्य कार्यक्रम था। सोचती थी कि उसके बाद ही हां कहूंगी।

गरमियां लगते ही मैं बडी दीदी के यहां पहुंचा गयी थी। जीजा जी का पद और बढ गया था। वह अधिशांषी अभियन्ता हो कर रीवा आ गये थे।यानी उनके ठाठबाठ और बढ गये थे। इस बार उन्होने मुझे लालच दे रखा था कि वह मुझे चचाई फाल दिखायेंगे। फाल के रेस्टहाउस में रिजर्वेशन भी हो गया था।

हम सब, मैं दीदी जीजा जी और दौनों भतीजे एक हफ्ते के लिये चचाई फाल पहुंच गये। रेस्टहाउस छोटा था। एक बडा गेस्टरूम एक छोटा गेस्टरूम और एक कमरा डाइनिंर्गलाउन्ज का जिसमें एक ओर सोफे और हट कर एक डाइनिंग टेबिल लगी हुयी थी।साथ में किचन था। खानसामा और दूसरे काम करने बाले पीछे रहते थे।

हम बडे क़मरे में ठहरे वह हवादार था। सब तरह की सहूलियत का सामान था।पर्दे कार्पेट साफ थे। रेस्टहाउस में काम करने बाले पूरी तत्परता से जुट गये थे।खानसामा ने शाम को अच्छी खासी दावत दे डाली।खाना बडा स्वादिस्ट बना था उस से भी ज्यादा थी उन लोगों की सेवा। बडे साहब का दबदबा बोल रहा था।

अभी दो दिन भी नहीं बीत पाये थे। शाम को हम लोग घूम कर लौटे तो रेस्टहाउस में हलचल थी।दो पुलिस की जीपें खडी थीं।दो पुलिस बाले मुस्तैदी से खडे थे। थानेदार बरामदे में घूम रहा था। रेस्टहाउस का अधीक्षक बेचैनी से इन्तजार कर रहा था।

देखते ही वह लपक कर बोला ''सा'ब कलैक्टर साहब आ रहे हैं आपको कमरा खाली करना पडेग़ा''।
जीजा जी कुछ न बोले पर सुनीता दीदी ने कहा ''पर हमने तो पहले से रिजर्वेशन करा रखी है''।
अधीक्षक ''उनका अचानक आने का प्रोग्राम बन गया''।
मैने कहा ''तो उनको साथ बाले कमरे में ठहरा दो''।
थानेदार मुझे घूर कर देखने लगा।
अधीक्षक निर्णय देता हुआ बोला ''आप उस कमरे में चले जाइये''।

जीजा जी सकते में आ गये। कमरे में आ कर उनको समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। मुझे बडा गुस्सा आ रहा था।अभी थोडा समय भी नहीं बीता था कि इनचार्ज कमरे में आ गया थानेदार उसके साथ ही था।
वह बोला ''सा'ब जल्दी करिये समय नहीं है'' और उसने एक सूटकेस उठा कर बाहर वरामदे में रख दिया।
मैं फट पडी ''तुम इस तरह कैसे सामान निकाल सकते हो।तुम्हें हमारा सामान छूने का कोई हक नहीं है''। ।

जीजा जी एक दम चुप खडे थे। उनका रौबदाब हवा हो गया था वह बडे दयनीय लग रहे थे।
दीदी मेरा हाथ पकड क़र बरज रहीं थीं ''सुमी चुपकर कलैक्टर साहब आ रहे हैं''।
मेरा गुस्से पर काबू नहीं था'' होगे कलैक्टर अपने घर के। ऐसा कहीं होता है''।

थानेदार कुछ कहने को था कि तभी लाल लाल बत्ती दिखाती सायरन बजाती हुयी एक जीप आकर खडी हो गयी। उसके पीछे एक कार रूकी।ड्राइवर ने छलांग लगा कर दरवाजा खोल दिया। थानेदार और सिपाही सैल्यूट की मुद्रा बना कर खडे हो गये।

कार से एक कालिजनुमा लडक़े को उतरते देख कर मैं दंग रह गयी। मै तो सोच रही थी कोई भारी भरकम प्रौढ क़लैक्टर साहब उतरेंगे पर छलांग लगा कर एक आकर्षक नवयुवक वरामदे में आ खडा हुआ।
थानेदार तपाक से बोले ''आइये सर''।
मेरा तमतमाया चेहरा देख कर उसने थानेदार को देखते हुये प्रश्न किया ''क्या बात है?''।
जवाब रेस्टहाउस अधीक्षक ने दिया ''उस कमरे में इंजीनियर साहब ठहरे हुये थे।''।
उसका जवाब उतनी ही जल्दी था ''तो में दूसरे कमरे में ठहर जाउॅगा।''।
जीजा जी ने धीरे से कहा '' सर मैं कमरा खाली किये देता हूं।''।
''नहीं आप उसमें आराम से रहिये'' कह कर वह दूसरे कमरे की तरफ बढ ग़या।

दीदी जीजा जी कलैक्टर के सरल व्यवहार से बहुत सन्तुष्ठ थे पर उस घटना से मेरा क्षोभ नहीं गया था।

रेस्टहाउस सक्रिय हो गया। थाने को अपनी आवाज से गुंजा देने बाला थानेदार दरबान की तरह कमरे के बाहर कुर्सी डाल कर बैठा था। बैंच पर सिपाही बैठे थे। कलैक्टर के दफ्तर का कोई मातहत भी बाहर आ कर बैठ गया था। सामने एक बोर्ड लटका दिया गया था ''शशांक कोठारी आई ए एस''
वहीं कलैक्टर का दफ्तर लग गया था।



डिनर के लिये गये तो उस कमरे की काया पलट हो गयी थी। नये पर्दे टांग दिये गये थे, नया टेबिल क्लाथ बिछा दिया गया था।नयी क्राकरी सज गयी थी।जहां जीजा जी बैठते थे वहां केवल एक प्लेट लगी थी। टेबिल के दूसरे किनारे हम लोगों की प्लेटें लगी थीं। मेरा क्षोभ फिर उभर आया।
हमारा खाना चल ही रहा था कि कलैक्टर शशांक का आगमन हुआ। सब उनकी सीट की तरफ दौड ग़ये। वह बढते हुये मेरी बगल में बैठ गये। जीजा जी के दोनों ओर बच्चे बैठे थे फिर दीदी एक तरफ बैठीं थीं दूसरी तरफ मैं।खानसामे ने झट से उनकी प्लेट उठा कर वहां लगा दी।खाने की कमी नहीं थी पर उनके सामने नये डौंगे सजा दिये गये जो वैसे के वैसे ही रखे थे क्योंकि वह तो दाना चुग रहे थे।

कलक्टर शशांक बडे सहज ढंग से जीजा जी दीदी से बात करने लगे ''कहां से हैं ? कौन सा विभाग है? कब आये? क्या अच्छा लगा?''।
दीदी भी बतियाने में कम नहीं थीं।
उन्होने पूछ लिया ''आप का घर कहां है?''
उन्होने ने जवाब दिया ''मैं ग्वालियर से हूं।''
दीदी ने कहा ''ग्वालियर में मेरी पक्की सहेली थी मीरा कोठारी। मेरे साथ सिंधिया स्कूल में पढती थी''।
वह आश्चर्य से बोल उठे ''वह मेरी बुआ हैं !''

दीदी की आवाज एकदम तेज हो गयी ''क्या तुम मीरा के भतीजे हौ''।
वह उत्साह में तुम पर उतर आयीं थीं।
दीदी नेफिर कहा ''मैं तुम्हारे घर गयी हूं। छोटी मोटी छुठ्ठियां मैं तुम्हारे घर पर ही बिताती थी। आंगन में नीम का पेड था।''
कलक्टर शशांक ने सिर हिलाते हुये कहा, ''नीम अब भी है।आपके बारे में भीमुझे कुछ याद पड रहा है।शायद मैं बहुत छोटा था।''

ताज्जुब है कि दुनिया इतनी छोटी हो सकती है। उन में आपस में जान पहचान निकल आयी थी।दीदी यादें ताजा करने में लग गयीं थीं। इस बीच दीदी उसकी आण्टी हो गयी थीं और कलैक्टर शशांक केवल शशांक।बीच बीच में जीजा जी भी बात करने लगते थे।मुझ को शामिल करने के लिये शशांक ने पूछा ''आप गयी हैं ग्वालियर?''
''जी नहीं मैं कभी नहीं गयी ग्वालियर''मेरी आवाज में बेरूखी थी।
उसके बाद उन्होंने मुझ से बात नहीं की।
वह बतियाते रहते अगर मातहत आ कर धीरे से न कहता ''सर बहुत लोग आपका इन्तजार कर रहे हैं''।



कमरे में आ कर दीदी मुझ पर बरस पडीं ''पता नहीं इस लडक़ी को किस बात का घमंड रहता है। वह इस से कितनी नम्रता से बोल रहा था और इस के हैं कि मिजाज ही नहीं मिलते''।
मैने कहा ''देखा नहीं अभी हम लोगों के साथ किस तरह का बर्ताव हुआ''।
दीदी ने बात काटी ''उसमें शशांक का क्या दोष? तुम्हारे साथ कोई बुरा बर्ताव किया है उसने,बोलो? वह तो भली तरह से पेश आ रहा है। चाहता तो तुम को इस कमरे से बाहर करने से कौन रोक सकता था''।

बात सच थी। पता नहीं मेरी कटुता उसकी तरफ क्यों थी। शायद उसके बडप्पन में मैं अपने को हीन समझ रही थी जैसे कि मेरा महत्व घट गया हो।दूसरे दिन जब हम सो कर उठे तो वह घूमने निकल चुके थे और जब हम लौट कर आये तो कलैक्टर की सवारी जा चुकी थी।वह दीदी के नाम एक संदेश छोड ग़ये थे।
दीदी महिमा मण्डित हो गयीं थीं 'कलैक्टर की आण्टी'।

आग्रह किया गया था कि हम सब लोग उनके यहां आयें।

बापिस रीवा आये तो घर पर भी 'कलैक्टर साहब' का फोन आया था। दीदी ने फोन मिलाया तो फिर वही आग्रह भरा बुलाबा।बच्चे जिद करने लगे तो दीदी राजी हो गयीं। जीजा जी तो अभी छुठ्ठियां बिता कर आये थे इसलिये जा नहीं सकते थे। मैने सोचा मना कर दूं। फिर सोचा यहॉ अकेली क्या करूंगी तो हामी भर दी।



कलैक्टर के बंगले पर पहुंची तो भौंचक रह गयी।सामने जितना बडा गांधी मैदान था उतना ही बडा बंगला था। एक एकड क़ा तो लान ही होगा।घर को सजाने संवारने का मंहगे से मंहगा सामान और फर्नीचर जमा किया हुआ था पर सब बेतकरीबी से बिखरा हुआ था। जीजा जी के यहां नौकरों की लाइन थी यहां तो शाही पलटन थी। पर तरीका सिलसिलाकोई नहीं था।बस सब काम किये जा रहे थे।

दूसरे दिन शशांक ने हम सब को डिनर पर ले जाने का प्रोग्राम बनाया। सबसे अच्छे रेस्ट्रारेंण्ट में खबर कर दी गयी। शाम होते ही रेस्ट्रारेंण्ट का मैनेजर आ कर बैठ गया ''साहब आप को ले जाने आया हूं।''
ऐन मौके पर मैंने मना कर दिया ''मेरी तबियत ठीक नहीं है आप लोग चले जाइये''।
शशांक मनाता तो शायद चली जाती।
लेकिन शशांक ने मैनेजर से कह दिया ''आज नहीं जायेंगे''।
मेनेजर बोला ''साहब कल आ जाऊं?''।
शशांक ने कहा ''नहीं जब आना होगा हम लोग पहुंच जायेगे''।

घर की हालत देख कर मुझसेरहा नहीं गया।कोई सामान ढंग से नहीं रखा था। मैने इंटीरियर डिकोरेशन में डिप्लोमा लिया था। घर संभालने में मेरी सुरूचि थी।मैने नौकरों की फौज को इकठ्ठा कर ड्राइंगरूम का रूप ही बदल दिया। दीदी मना करती रहीं किसी के घर को उससे पूछे बगैर मत छेडाे।
शशांक कमरे में घुसा तो अचकचा गया जैसे कहीं और आ गया हो।

उसके मुंह से निकल गया ''वाओ!इसकी तो काया ही पलट हो गयी है। धन्यवाद आण्टी''।
दीदी ने कहा ''ये सब इसका किया धरा है''।
वह सीधा मेरे पास आया और कृतज्ञता से बोला ''सुमन इतना सब करने के लिये मैं सही मायने में आभारी हूं।मैने कहा ''घर और सामान बहुत खूबसूरत है बस फेर बदल की जरूरत है''।

शशांक बोला ''आप में बाकई बहुत हुनर है''।
बात में बनावट नहीं थी । मुझे अच्छा लगा।दूसरे दिन मैं दीदी और बच्चे शॉपिंग को निकल गये।तय हुआ था कि लौटते समय शशांक कोले लेंगे फिर रेस्ट्रारेण्ट में साथ लंच करेगे।शशांक आगे बैठा था हम सब पीछे। मैने नई फिल्म का पोस्टर देखा।मुझे सिनेमा का बडा शौक है।मेरे मुंह से निकल गया ''ओ यहां तो यह फिल्म लगी है''।

शशांक ने ड्राइवर से कहा ''यहां के थाने की तरफ से निकलते चलो''।
गाडी थाने के पहले खडी क़र दी गयी।ड्राइवर थानेदार को बुलाने चला गया।
वहां से दौडा दौडा दरोगा आया ''हुजूर थानेदार साहब तो खाने पर गये हैं आप हुकुम करें''।
उसका नाम पढते हुये शशांक ने कहा ''रामसिंह शाम के शो के लिये इस फिल्म के टिकिट रोक लेना''।
शाम को हम लोग सिनेमा हाल पहुंच गये। शशांक को सीधा पहुंचना था। वहां पुलिस बाले पहले से ही खडे हुये थे। कार रूकते ही एक ने आगे बढ कर दरवाजा खोल दिया।मैनेजर भागा भागा आया ''मैडम आइये पहले चाय पी लीजिये तब तक साहब भी आ जायेंगे''।

वह मुझे कलैक्टर की पत्नि समझ रहा था।
दीदी ने धीरे से कहा ''सुमन जान रही हो यह क्या समझ रहा है''।
पर मैं उसकी गलतफहमी दूर करने की हिम्मत न जुटा पायी।
चाय के लिये मना कर के हम लोग हाल में पहुंचे तो पांच लोगों के लिये आगे की पूरी लाइन रोक ली गयी थी।शशांक देर से पहुंचे।वह आकर मेरे बगल में बैठ गये। उन्होने पूछा ''क्या हुआ?''

मैने फुसफुसाकर उसको तब तक की कहानी बताा दी।यह हम लोगों की पहली सीधी बातचीत थी।
लौटने के पहले के दो तीन दिन हंसी खुशी बीते। जितना मैं शशांक को जानती गयी वह उतने ही भले लगने लगे।

मैं राजन से बातें करती रहती थी पर शशांक से फोन पर सीधे बातें नहीं करती थी। दीदी के द्वारा बातें होती थी। शशांक ने कहा ''आण्टी सुमन से कहो कमरे उसकी सजावट का इन्तजार कर रहे हैं''।
मैने चुटकी लेते हुये दीदी से कहा ''मैं उसकी नौकर नहीं लगी हूं''।

हांलाकि दीदी ने यह उस से कहा नहीं।

गरमियों के अन्त में कला मंच मेरा प्रोग्राम दिल्ली में कर रही थी। उनकी एक सहयोगी संस्था रीवा में थी उन्होंने एक छोटे स्तरपर मेरा नृत्यबैले यहॉ प्रस्तुत किया। जीजा जी ने दीदी ने और मैने अपने जानने बालों को आमंत्रित किया। राजन आ रहे थे। दीदी से कह कर मैने शशांक को भी बुलाया।

शो पर भीड तो ज्यादा नहीं थी पर बाहर के लोग भी आये।राजन ऐन मौके पर काम निकल आने से ना आ पाये। शशांक ने सीधा आ कर मुझसे हाथ मिलाया ''सुमन बधाई हो आप बहुत बडी क़लाकार हो''।

दूसरे दिन नाश्ते की मेज पर सब बैठे थे शो की बात चल रही थी।
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