फिर वही
उदास सूनी साँझ
देख रही थी
हल्की बारिश में
मेरी धमनियों में
बहते हुए
लहू का जमना
हल्की हल्की बारिश
जो तूफान के बाद भी
तूफान के होने का
अहसास करा रही थी
मैं खुद को
तलाश रही था


यूँ छेड़ कर धुन
कोई रुक गया
कि मैं विवश सा
गुनगुनाता रहा
सारी रात
उस छूटे हुए
टूटे हुए
सुर को
सुनहरी पंक्तियों
के
वस्त्र पहनाता रहा
गाता रहा
गुनगुनाता रहा