03/03:
Category: General
Posted by: Sushil Bansal
फिर वही
उदास सूनी साँझ
देख रही थी
हल्की बारिश में
मेरी धमनियों में
बहते हुए
लहू का जमना
हल्की हल्की बारिश
जो तूफान के बाद भी
तूफान के होने का
अहसास करा रही थी
मैं खुद को
तलाश रही था
यूँ छेड़ कर धुन
कोई रुक गया
कि मैं विवश सा
गुनगुनाता रहा
सारी रात
उस छूटे हुए
टूटे हुए
सुर को
सुनहरी पंक्तियों
के
वस्त्र पहनाता रहा
गाता रहा
गुनगुनाता रहा
उदास सूनी साँझ
देख रही थी
हल्की बारिश में
मेरी धमनियों में
बहते हुए
लहू का जमना
हल्की हल्की बारिश
जो तूफान के बाद भी
तूफान के होने का
अहसास करा रही थी
मैं खुद को
तलाश रही था
यूँ छेड़ कर धुन
कोई रुक गया
कि मैं विवश सा
गुनगुनाता रहा
सारी रात
उस छूटे हुए
टूटे हुए
सुर को
सुनहरी पंक्तियों
के
वस्त्र पहनाता रहा
गाता रहा
गुनगुनाता रहा