आम इंसान को खास से छोटा
समझने के संदेश
बड़ी खबर बन जाते हैं।
बाजार चलाता है प्रचारतंत्र
या वह बाजार को
हम समझ नहीं पाते हैं।
अल्बत्ता बड़े लोगों की की
तयशुदा शब्दिक कुश्तियों को देखकर
कभी कभी हम भी
गलती से सच समझ जाते हैं।