17/06: भूख
Category: General
Posted by: Sushil Bansal
बस्ती पे उदासी छाने लगी,
मेलों की बहारें ख़त्म हुई
आमों की लचकती शाखों से
झूलों की कतारें ख़त्म हुई
धूल उड़ने लगी बाज़ारों में,
भूख उगने लगी खलियानों में
हर चीज़ दुकानों से उठकर,
रूपोश हुई तहखानों में
बदहाल घरों की बदहाली,
बढ़ते-बढ़ते जंजाल बनी
महँगाई बढ़कर काल बनी,
सारी बस्ती कंगाल बनी
चरवाहियाँ रस्ता भूल गईं,
पनहारियाँ पनघट छोड़ गईं
कितनी ही कंवारी अबलायें,
माँ-बाप की चौखट छोड़ गईं
मेलों की बहारें ख़त्म हुई
आमों की लचकती शाखों से
झूलों की कतारें ख़त्म हुई
धूल उड़ने लगी बाज़ारों में,
भूख उगने लगी खलियानों में
हर चीज़ दुकानों से उठकर,
रूपोश हुई तहखानों में
बदहाल घरों की बदहाली,
बढ़ते-बढ़ते जंजाल बनी
महँगाई बढ़कर काल बनी,
सारी बस्ती कंगाल बनी
चरवाहियाँ रस्ता भूल गईं,
पनहारियाँ पनघट छोड़ गईं
कितनी ही कंवारी अबलायें,
माँ-बाप की चौखट छोड़ गईं